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ताकि देशवासी सचाई जान सकें

सम्पादकीय. रक्षा मंत्री एके एंटनी ने 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 व 1971 में हुए भारत-पाक युद्धों से संबंधित वर्गीकृत दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने का संकेत देकर रक्षा विशेषज्ञों और अध्येताओं की एक लंबी मांग पूरी करने की दिशा में बड़ी पहल की है। उम्मीद है कि सरकार इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की संबंधित विशेषज्ञ समिति की सिफारिश को मंजूरी देने में अनावश्यक टालमटोल नहीं करेगी और उपरोक्त सभी युद्धों की तरह बाकी युद्धों का प्रामाणिक इतिहास देश के सामने आ सकेगा तथा देशवासी इन युद्धों में विभिन्न मोर्चो पर हुई घटनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में देख-समझ सकेंगे।

हकीकत है कि 1962 में चीन के हमले का सामना करने में हमारी सेनाएं बुरी तरह विफल रही थीं और चीन ने हमारे 22,000 वर्ग किलोमीटर भू-क्षेत्र को हथिया लिया था। आजाद भारत के इतिहास में यह एक ऐसा काला अध्याय है जिसका दंश हरेक राष्ट्रप्रेमी को अभी तक चुभता है। यह वह दौर था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पंचशील के सिद्धांत की दुहाई देते नहीं अघाते थे और हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देश में आम था। यह भी हकीकत है कि चीन ने अचानक हमला करके दोस्त देश की पीठ में छुरा भोंका था। भारत सरकार ने इस युद्ध में हुई चूकों की पड़ताल करने के लिए हेंडरसन-ब्रुक्स रिपोर्ट तैयार कराई थी लेकिन इस रिपोर्ट का खुलासा अब तक नहीं किया गया है। इस वजह से देश को अब तक नहीं पता चल सका है कि 1962 की हिमालयी चूक की असली वजह क्या थी। यह बात दीगर है कि उस युद्ध के बाद लंबा अरसा गुजर चुका है और भारत-चीन संबंधों में भी बहुत बदलाव आ चुका है फिर भी इस युद्ध के बारे में लोगों की जिज्ञासाएं शांत होनी ही चाहिए।

पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 में हुए युद्धों में भारत की निर्णायक जीत हुई थी। इन दोनों युद्धों का स्वर्णिम इतिहास भारतीय सेना के रणनीतिक कौशल की शानदार कहानी है, इसके बावजूद इनका प्रामाणिक इतिहास अब तक देश के सामने नहीं आया है जबकि 1971 के युद्ध की रणनीति को लेकर आला सेनाधिकारियों के बीच मतभेद बयानों के रूप में सार्वजनिक हो चुके हैं। ऐसे में वर्गीकृत दस्तावेजों के खुलासे से इन बयानों की हकीकत भी उजागर हो सकती है। किसी भी देश के रणनीतिक-सामरिक इतिहास में उजले और काले अध्याय आते ही रहते हैं। इन अध्यायों का वस्तुनिष्ठ अध्ययन भविष्य की दिशा तय करने में हमें मदद देता है। उम्मीद है कि वर्गीकृत दस्तावेजों के सार्वजनिक होने से देश की सीमाओं की सुरक्षा और भी बेहतर तरीके से की जा सकेगी।





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