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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. पिछले दिनों लोक शिक्षण संचालनालय ने प्रदेश के सभी जिलों के जिला शिक्षाधिकारियों को पत्र लिखकर जिलेभर में संचालित सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बीपीएल छात्र-छात्राओं की जानकारी इकट्ठी कर भेजने के निर्देश दिए थे।
जिले के 3 हजार से अधिक प्राइमरी स्कूलों में तकरीबन साढ़े तीन लाख, एक हजार मिडिल स्कूलों में डेढ़ लाख व 127 हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों में 25 हजार से अधिक छात्र अध्ययन कर रहे हैं। कुल मिलाकर तकरीबन 5 लाख 75 हजार से अधिक छात्र-छात्राओं के नाम जिले के स्कूलों में दर्ज है।
इनमें से 1 लाख 78 हजार, 950 छात्र-छात्राओं को जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय ने गरीब बताया है। इनमें प्राइमरी के 1 लाख 29 हजार 616, मिडिल के 41 हजार 158 और हाई स्कूल व हायर सेकेंडरी स्कूलों के 8176 छात्र-छात्राओं को गरीबी रेखा के नीचे होना बताया गया है। जानकार इस जानकारी को महज खानापूर्ति बता रहे हैं।
विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक जानकारी तैयार करने कार्यालय को महज एक सप्ताह का समय मिला। जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय से ब्लाक शिक्षाधिकारियों को फोन कर जल्द से जल्द बीपीएल छात्र-छात्राओं की जानकारी तैयार कर भेजने के निर्देश दिए गए। इसके बाद ब्लाक शिक्षाधिकारियों ने प्रधानपाठक व प्राचार्यो को पत्र लिखकर इसकी सूचना दी।
समय कम होने के कारण स्कूलों में शिक्षकों ने छात्र-छात्राओं से ही पूछा कि क्या उनके घर में गरीबी रेखा वाला पीला कार्ड है। जिन छात्र-छात्राओं ने हां कहकर हाथ उठाया, उनकी बात को सच मानकर उनकी गणना कर उसी आधार पर जानकारी तैयार कर ब्लाक शिक्षाधिकारी कार्यालय फिर जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय भेज दी गई। इसके बाद जानकारी लोक शिक्षण संचालनालय रायपुर भेज दी गई।
जानकारों का कहना है कि कम समय होने का ये मतलब तो नहीं कि कार्यालय द्वारा फर्जी जानकारी ही विभाग को भेज दी जाए। अधिकारियों ने लापरवाही का परिचय देते हुए सूची की जांच करना भी जरूरी नहीं समझा और उसे आला अधिकारियों के अवलोकन के लिए जस का तस भेज दिया।
इधर लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा भेजी गई जानकारी के आधार पर ही जिले के गरीब छात्र-छात्राओं की संख्या दर्ज कर ली है, जबकि तैयार की गई सूची और वास्तविकता में बड़ा अंतर हो सकता है।
क्या कहते हैं शिक्षक?
शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि उन्हें बताया ही नहीं गया कि किस तरह बीपीएल छात्र-छात्राओं की जानकारी तैयार करनी है। न तो इस विषय में जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय से कुछ निर्देश मिला और न ही ब्लाक शिक्षाधिकारी कार्यालय से। ऐसे में जो आसान रास्ता उन्हें समझ में आया उन्होंने अपना लिया और जानकारी भेज दी। शिक्षक खुद स्वीकार करते हैं कि छात्र फायदा मिलने के चक्कर में झूठ भी बोल सकते हैं। वे उनकी गारंटी नहीं ले सकते।