बीकानेर. ग्लोबलाइजेशन के दौर में जानकारी के लिए अब भाषाओं का महत्व बढ़ रहा है। राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान संस्थान (एनआरसीसी) भी अब ऊंट के इतिहास को हिंदी-अंग्रेजी के अलावा जर्मन व फ्रेंच में लिपिबद्ध कराने की तैयारी कर रहा है। पर्यटकों की दस्तक एनआरसीसी पर बढ़ी और इससे केन्द्र की प्रति वर्ष आय में भी इजाफा हुआ है।
पर्यटकों की रुचि को देखते हुए ऊंटनी के दूध की कुल्फी, कॉफी सहित अन्य उत्पाद तो मुहैया करा दिए गए लेकिन ऊंटों से जुड़ी जानकारी के लिए केन्द्र ऊंटों का इतिहास जर्मन-फ्रेंच में कराएगा। इतना ही नहीं केन्द्र में लगे विभिन्न बोर्ड भी हिंदी-अंग्रेजी के अलावा जर्मन-फ्रेंच सहित कई अन्य भाषाओं में लगेंगे।
दरअसल कई देशों के पर्यटक ऐसे होते हैं जिन्हें हिंदी-अंग्रेजी का ज्ञान कम होता है। ऐसे में वे चाहकर भी ऊंटों के बारे में नहीं जान पाते। चूंकि औसतन यहां अधिकांश पर्यटक जर्मन-फ्रेंच भाषा के जानकार पहुंचते हैं इसलिए केन्द्र ने यह फैसला लिया है।
पिछले दिनों आए राज्यपाल एस.के.सिंह ने केन्द्र को यह सुझाव दिया था जिसकी पालना में केन्द्र जुट गया है। ऊंटों से जुड़ी रोचक जानकारी के लिए अब जर्मन-फ्रेंच के जानकारों की तलाश हो रही है ताकि इसके इतिहास को लिपिबद्ध कराया जा सके। इसी भाषा की लिपिबद्ध पुस्तकें पर्यटकों को खरीदने के लिए मुहैया कराए जाने की योजना भी है। उष्ट्र अनुसंधान संस्थान के स्वागत बोर्ड भी दोनों भाषाओं का उपयोग किया जाएगा।
गौरतलब है कि केन्द्र पर कई ऐसे बोर्ड हैं जहां सिर्फ हिंदी भाषा का उपयोग किया गया है जबकि पर्यटक के रूप में अधिकांश विदेशी होते हैं। राज्यपाल ने जब यहां विदेशी सैलानियों की संख्या देखी तो केन्द्र को यह सुझाव दिया। उन्होंने मिल्क पार्लर, कॉफी अन्य उत्पादों के बारे में अलग से जानकारी के लिए पुस्तक छपाने के लिए कहा।
पर्यटन विभाग के काम आएगा सूत्र
राज्यपाल एस.के.सिंह ने सुझाव भले ही एनआरसीसी को दिया हो लेकिन पर्यटन विभाग इस अमल करे तो उसको भी इसका फायदा मिल सकता है। केन्द्र जूनागढ़ के सामने एक बोर्ड भी लगा सकता है जिसमें विदेशी भाषा में बीकानेर इतिहास की जानकारी दी जा सकती है। फिलहाल इसका अभी अभाव है जबकि सैलानियों के लिए बीकानेर महत्वपूर्ण स्थल है।