नई दिल्ली. ब्रिटेन और फ्रांस के समर्थन के बावजूद परमाणु करार के मुद्दे पर यूरोपीय संघ के साथ 29 नवंबर से शुरू होने वाली बातचीत में भारत को अपना पक्ष मजबूती से पेश करने में दिक्कत हो सकती है। करार को लेकर भारत में विपक्षी दलों के विरोध ने परमाणु सामग्री के आपूर्तिकर्ता देशों के समूह (एनएसजी) में सक्रिय भारत विरोधी लॉबी को उत्साहित कर दिया है। ऐसे में जब तक भारत और आईएईए के बीच सुरक्षा मापदंडों को लेकर सहमति नहीं बन जाती, यूरोपीय संघ को मनाना भारत के लिए आसान नहीं होगा।
भारत विरोधी लॉबी को शह :
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, एनएसजी के 45 सदस्य देशों में सक्रिय भारत विरोधी लॉबी ने अपनी इस मांग पर फिर जोर देना शुरू कर दिया है कि चूंकि भारत ने परमाणु निरस्त्रीकरण संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए उसे परमाणु सामग्री के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का हिस्सा न बनाया जाए। पुर्तगाल की अहम भूमिका : सूत्रों ने बताया कि गुरुवार से शुरू हो रही बैठक में परमाणु करार प्रमुख मुद्दा होगा और इस मामले पर आम राय कायम करने में यूरोपीय संघ के अध्यक्ष होने के नाते पुर्तगाल की अहम भूमिका रहेगी। भारत से मित्रवत संबंध होने के बावजूद पुर्तगाल ने करार को लेकर अपनी स्पष्ट राय नहीं जताई है।
भारत में पुर्तगाल के राजदूत लुइस फिलिप मेंडिस के अनुसार, परमाणु करार को लेकर भारत और आईएईए के बीच जारी वार्ता के नतीजे पर सारा दारोमदार रहेगा। तकरीबन यही बात भारत में यूरोपियन कमीशन के राजदूत ने भी कही है। सूत्रों का कहना है कि ब्रिटेन और फ्रांस के समर्थन के बावजूद भारत को यूरोपीय संघ के सदस्य स्कैंडेनेवियाई देशों को राजी करना होगा, जिनमें से कई देशों का रुख अभी भी नकारात्मक ही है।