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हैरत है ऐसे जनप्रतिनिधियों पर

अभिमत. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने दावा किया है कि चार राज्यों के मुख्यमंत्री और लगभग डेढ़ सौ सांसदों ने उनसे मिलकर तंबाकू सेवन को हतोत्साहित करने वाले अभियान को ढीला करने की सिफारिश की है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्री ने अब तक इन सांसदों व मुख्यमंत्रियों के नाम जाहिर नहीं किए हैं, मगर यदि यह बात सच है तो बेहद चिंताजनक है।

माना कि देश के कुछ हिस्सों में किसानों का मुख्य आधार तंबाकू की खेती है और सिगरेट कंपनियों से टैक्स के रूप में भारी-भरकम राजस्व मिलता है, मगर कैंसर से होने वाली मौतों, परिवारों के बिखराव और मरीज की पीड़ा से परिजन को होने वाले मानसिक कष्ट को ध्यान में रखते हुए इन फायदों का आकलन करना होगा। सिगरेट-बीड़ी के पैकेट पर भयानक चित्रों के साथ चेतावनी छापने का विरोध करने वालों का तर्क रहा है कि धूम्रपान घटने से लाखों मजदूर प्रभावित होंगे। तेजी से विकासशील मुल्क के रूप में हमें गौर करना होगा कि कैंसर के इलाज और रिसर्च पर होने वाले बेतहाशा खर्च के सामने इस तरह का रोजगार कहां तक उचित है। क्या केंद्र और राज्य सरकारें वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराने में इतनी ही असमर्थ हैं कि रोजगार और मौत के बीच चुनाव में उनकी तरजीह ‘मौत’ को है?

हालांकि देश में पहले से ही तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल के विरोध में कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कितना हो रहा है यह कोई रहस्य नहीं है। कानून तो यहां तक है कि यदि आप अपने घर में भी सिगरेट पी रहे हैं, और आपकी नौकरानी को इससे ऐतराज है, तो आप अपने इस जानलेवा शौक को पूरा नहीं कर सकते। हमारे देश में अमेरिका और अन्य कई विकसित देशों की तरह कानून का पालन क्यों नहीं हो सकता, जहां सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान कतई संभव नहीं है? हर फिक्र को धुएं में उड़ाने की गलतफहमी पालने वालों को जिंदगी की कीमत समझाने के लिए हरसंभव कदम उठाया जाना जरूरी है।





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