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राजकाज पर भारी भीड़ की सीनाजोरी

दृष्टिकोण. अगर आप किसी फिल्म पर सेंसर की कैंची चलवाना चाहते हैं, किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगवाना चाहते हैं या फिर किसी प्रदर्शनी में रखी पेंटिंग हटवाना राजकाज पर भारी भीड़ की सीनाजोरीचाहते हैं तो आपको ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस घर से निकलिए, कुछेक लोगों को इकट्ठा कीजिए और यहां-वहां पत्थरबाजी करिए। इतना भर करने पर सरकार बिना देर किए आपकी मंशा पूरी कर देगी। फिल्म सेंसर कर दी जाएगी, पुस्तक पर प्रतिबंध लग जाएगा और पेंटिंग प्रदर्शनी से हटा ली जाएगी। यदि आपके द्वारा जुटाए गए लोग कुछ ज्यादा शोर-शराबा कर सकते हैं और एक-दो बसों, कुछ वाहनों को आग के हवाले करने का माद्दा रखते हैं तो फिर आप संबंधित फिल्मकार, लेखक और पेंटर पर रोक तक लगवा सकते हैं।

जी हां, यह एक स्वयंसिद्ध फामरूला है जिसे अपने देश में बहुत से लोग बड़ी कुशलता से आजमा चुके हैं और आजमा रहे हैं। हमारे राजनेता इस कदर डरपोक हो चले हैं कि वे लोगों के सड़कों पर निकलने भर से खौफ खाते हैं। आप सड़क पर उतरकर और एक-दो पत्थर फेंककर चंद सेकंडों की साउंडबाइट्स के लिए भूखे बैठे टीवी पत्रकारों-फोटोग्राफरों को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं। ऐसा करते समय जरूरी नहीं कि उन्हें बताने के लिए आपके पास कोई ठोस तर्क हों। यह काम आपका तमतमाया हुआ चेहरा पूरा कर देगा।

आप अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो इस तरह के ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। अस्सी के दशक में सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सेज’ के खिलाफ इसी तरह के आंदोलन की याद करें। तब इस पुस्तक को प्रतिबंधित करने वाले देशों में भारत सबसे आगे था। इसी तरह गांधी हत्याकांड पर केंद्रित ‘नाइन आवर्स टु राम’ फिल्म पर चंद लोगों के विरोध के कारण रोक लगा दी गई थी। रुश्दी का मामला पहला ऐसा मामला था जब दुनिया भर में विरोध के सुर गूंजे थे और चूंकि मामला संवेदनशील था और विरोध करने वालों का वर्ग काफी बड़ा था इसलिए पुस्तक पर रोक लगाने के फैसले को समझदारी का नाम दे दिया गया। याद दिलाते चलें कि यह फैसला भारी बहुमत से सत्ता में आए राजीव गांधी के दौर में लिया गया था। इसके बाद तो देश का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया। गठबंधन सरकारों का दौर आया और हरेक पार्टी अपने-अपने वोट बैंक के हित साधने के एजेंडे पर काम करने लगी। इस दौर में कोई भी सरकार किसी वोट बैंक को नाराज कर उनका समर्थन नहीं खोना चाहती है। निहित स्वार्थो से जुड़े कुछ समूहों ने सरकार की यह कमजोरी भांप ली और भरपूर फायदा उठाने लगे। और जब अल्पसंख्यकों से जुड़ा मामला हो तो फिर सभी पार्टियां शुतुरमुर्गी मुद्रा अपनाने में ही अपना भला देखने लगीं।

मीडिया के विस्तार ने इस समस्या को और भी विकट बना दिया। विभिन्न टीवी चैनलों पर एक ही दृश्य को बार-बार दिखाने तथा क्लोज-अप के जरिये मुट्ठीभर लोगों को विशाल भीड़ के रूप में पेश करने का सिलसिला चल पड़ा। अक्सर तमाम न्यूज चैनल इरादतन ऐसा करते हैं और वे इसके दूरगामी परिणामों की जरा भी परवाह नहीं करते। ऐसे प्रसारणों से दर्शकों में उत्तेजना फैलती है और राजनेताओं पर दबाव बनता है। राजनेताओं को शायद यह भी पता होता है कि सड़कों पर विरोध करने निकले लोग संबंधित समाज के वास्तविक प्रतिनिधि नहीं हैं पर वे मौका नहीं लेना चाहते हैं। इस वजह से उस रियलिटी शो, जिसका रियलिटी से दूर-दूर का नाता नहीं होता, का दायरा बढ़ता ही जाता है।

देश के सबसे बड़े पेंटरों में शुमार एमएफ हुसैन का ही उदाहरण लें। उन्हें अपनी जिंदगी के अंतिम वर्ष निर्वासन में गुजारने पड़ रहे हैं। आखिर उनके खिलाफ क्या मामला है? उन पर आरोप है कि उन्होंने हिंदू देवी का नग्न चित्रण करके हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। भारतमाता का चित्रण करने वाली उनकी पेंटिंग से भी कुछ लोग खफा हैं। इन लोगों की असलियत और हैसियत कोई नहीं जानता, लेकिन ये लोग देश के करोड़ों हिंदुओं के प्रतिनिधि तो नहीं ही हैं। फिर भी हुसैन का जीवन खतरे में है और भारत सरकार उन्हें सुरक्षा प्रदान करने या उन्हें धमकाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय उन्हें देश से बाहर बने रहने की सलाह देती है।

तसलीमा नसरीन का मामला हमारे उन राजनेताओं के लिजलिजेपन का और भी हतप्रभ कर देने वाला उदाहरण है जो खुद को धर्म निरपेक्षता और मानवाधिकारों का पैरोकार बताते हैं। तसलीमा भारत में इस वजह से रह रही हैं कि उनके अपने वतन बांग्लादेश में उनकी जान को खतरा है। भारत में उनकी मौजूदगी कट्टरपंथी मुस्लिमों को जरा भी नहीं सुहाती है पर वे जानते हैं कि उनके विरोध को तवज्जो नहीं दी जाएगी। लेकिन नंदीग्राम मामले में प. बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के संकट से घिरने पर इन कट्टरपंथियों को मौका मिल गया। उन्होंने कोलकाता के कुछ इलाकों में हिंसक प्रदर्शन क्या किए, प. बंगाल सरकार ने तसलीमा को कोलकाता छोड़ने की सलाह दे डाली। इस तरह कुछ निहत्थे ग्रामीणों की ‘बहादुराना’ हत्या करने वाली माकपा ने कुछेक लोगों के विरोध प्रदर्शन के सामने झुककर भीड़तंत्र को जीत का एक और तोहफा दे दिया।

जहां एक ओर हमारे राजनेता कायराना हरकतें कर रहे हैं वहीं हमारे बुद्धिजीवियों की भूमिका भी संदेहास्पद है। तसलीमा के मामले में उदारवादी बुद्धिजीवी तक पसोपेश में हैं-वजह, यह मामला अल्पसंख्यकों से जो जुड़ा है। इनमें यह मानने वालों की संख्या भी खासी बड़ी है (जरूरी नहीं कि वे मुस्लिम ही हों) कि यदि तसलीमा की मौजूदगी से इस कदर उत्तेजना और गुस्सा भड़क सकता है तो भारत की नागरिकता देने के उनके आवेदन पत्र पर भारत सरकार को नए सिरे से विचार करना चाहिए।

दरअसल, ऐसे मामलों में कोई भी फैसला सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए न कि हिंसक उत्पात मचाकर कुछ देर के लिए किसी शहर को बंधक बना लेने वाली कुछ लोगों की भीड़ की मर्जी पर। एमएफ हुसैन के मामले में भी ऐसा ही किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में लोगों की इच्छा सर्वोपरि होती है न कि भीड़ की सीनाजोरी। राजकाज करन वालों को बेहिचक होकर देशवासियों को यह दो-टूक संदेश देना ही होगा।





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