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सम्पादकीय. विवादास्पद बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन को लेकर देश में पिछले चार-पांच दिनों में जो कुछ घटा है और जिस तरह की बयानबाजी हो रही है उससे एक लोकतांत्रिक देश के रूप में दुनिया के सामने हमारी अच्छी छवि नहीं बनती है। तसलीमा के समर्थन में हिंदुत्ववादी ताकतों के अचानक उठ खड़े होने तथा वामपंथियों द्वारा कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक देने से स्थितियां और पेचीदा हुई हैं। धर्मनिरपेक्षता के तथाकथित पैरोकारों की लंबी खामोशी ने भी हालात बिगाड़े हैं जिन्हें दुरुस्त करने के लिए फौरी उपाय जरूरी हैं।
बीते हफ्ते का घटनाक्रम तसलीमा के लिए बेहद तकलीफदेह है तो उन तमाम देशवासियों के लिए भी कम पीड़ाजनक नहीं है जो अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं, बहुलतावादी संस्कृति व धर्म निरपेक्ष समाज व्यवस्था पर गर्व करते आए हैं। यदि हम तसलीमा को देश में ही इधर-उधर ठोकरें खाने के लिए मजबूर करते हैं या फिर पश्चिम के किसी देश में जाने की सलाह देते हैं तो फिर किस मुंह से आदर्श लोकतंत्र होने का दावा करेंगे और किस मुंह से अपनी सहिष्णुता का डंका पीटेंगे? हकीकत है कि तसलीमा के मामले में देश का राजकाज चलानेवाले लोग एक के बाद एक चूक करते गए हैं। इन चूकों को दुरुस्त करने में और देर की गई तथा तसलीमा के खिलाफ बवंडर खड़ा करने वालों को और ढील दी गई तो हालात बदतर ही होंगे। इसलिए केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों की सरकारों को वोट बैंक की परवाह किए बगैर तसलीमा के बारे में दो-टूक फैसला करना होगा।
जाहिर है कि यह फैसला तसलीमा को भारत में सुरक्षित आश्रय प्रदान करना ही हो सकता है, न कि उन्हें किसी और देश जाने की सलाह देना। अव्वल तो पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार को ही अपनी गलती सुधार कर तसलीमा को कोलकाता में रहने देने और सुरक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। यदि वह ऐसा करने से हाथ खड़े कर देती है तो फिर यह जिम्मेदारी केंद्र को निभानी चाहिए। तसलीमा के वीजा की अवधि बढ़ाने या उन्हें भारत की नागरिकता देने के मामले इतने जटिल नहीं है कि उन पर फैसला लेने में टाल-मटोल की जाए। दीगर है कि उन्हें राजनीतिक शरणार्थी का दर्जा इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि उनके पास स्वीडन का वीजा है।
यह मामला मूलत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है जो किसी भी आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य पहचान है। इसलिए हरेक लोकतंत्र प्रेमी को, भले ही वह तसलीमा के लेखन से इत्तेफाक रखता हो या नहीं, इस मौके पर उनके साथ खड़ा होना चाहिए।