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अजमेर. आए दिन मुकदमों और कानून से रू-ब-रू होने वाली पुलिस, सेंट्रल जेल में बीते दिनों हुए कत्ल के मामले में गंभीर चूक कर गई। कानूनविदों की मानें
तो हत्या के मुकदमे में सजा भुगत रहे मुजरिम को कत्ल के इल्जाम में आइपीसी की ऐसी धारा के तहत गिरफ्तार किया गया था, जिसे 25 साल पहले देश की सबसे बड़ी अदालत असंवैधानिक ठहरा चुकी है। इसी अस्तित्वहीन धारा के तहत आरोपी को रिमांड पर भी लिया गया। लाडनूं निवासी मांगीलाल के विरुद्ध पुलिस ने 11 नवंबर को धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज की।उसे गिरफ्तार धारा 303 के तहत गिरफ्तार किया गया, जबकि 1983 में सुप्रीम कोर्ट इस धारा को असंवैधानिक करार देकर अस्तित्वहीन कर चुकी है।
कानून के जानकारों के मुताबिक, असंवैधानिक ठहराए जाने के बाद इस धारा के तहत दर्ज मुकदमों के मुल्जिम बरी हो गए थे। पुलिस ने मांगीलाल को धारा 303 के तहत गिरफ्तार करने के लिए प्रोडेक्शन वारंट हासिल किया था। 12 नवंबर को उसे जेल से गिरफ्तार कर न्यायिक मजिस्ट्रेट के. सी. बुगालिया की अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उसे एक दिन के रिमांड पर पुलिस को सौंप दिया था। पूछताछ के बाद पुलिस ने मांगीलाल को वापस जेल भेज दिया था।
धारा 303..
भारतीय दंड संहिता की धारा 303 में प्रावधान था कि आजीवन कारावास की सजा भोग रहा बंदी हत्या करेगा, तो उसे मृत्यु दंड दिया जाएगा।
1983 में अस्तित्वहीन..
सुप्रीम कोर्ट ने (एआईआर 1983 एससी 473) मिट्ठू बनाम पंजाब सरकार प्रकरण में धारा 303 को असंवैधानिक करार दे दिया
* मांगीलाल को उम्रकैद की सजा हो चुकी थी। जेल में मर्डर का मामला सामने आने के बाद मांगीलाल का रिकॉर्ड हासिल किया गया और धारा 303 के तहत उसे गिरफ्तार कर रिमांड लिया गया।
अजीतसिंह, एसआइ, सिविल लाइंस थाना
* सुप्रीम कोर्ट आईपीसी की धारा 303 को स्ट्रक डाउन कर चुकी है। पुलिस यदि इस धारा पर अमल करती है तो यह अनुचित है। हालांकि कानून की किताबों में आज भी धारा 303 छपकर आ रही है, लेकिन उसके नीचे सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी स्पष्ट अंकित है। मुझे लगता है कि धारा को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद इसे किताबों से हटाने के लिए विधिवत प्रक्रिया नहीं अपनायी गई। - विनोदशंकर दवे, रिटायर्ड जज, हाईकोर्ट
* धारा 303 अब अस्तित्व में नहीं है। अस्सी के दशक में किशनगढ़ राजघराने के एक सदस्य की हत्या के इल्जाम में सजायाफ्ता भीमा चौधरी ने पैरोल के दौरान एक महिला की हत्या कर दी थी। पुलिस ने धारा 303 के तहत ही मामला दर्ज किया था, लेकिन अदालत ने उसे इस धारा के तहत सजा नहीं दी। जो धारा अस्तित्व में नहीं है, उसके तहत गिरफ्तारी हो नहीं सकती, रिमांड देने, जेल भेजने की प्रक्रिया भी नहीं की जा सकती है।
-अनिल नाग, सीनियर एडवोकेट