अभिमत. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा इस सप्ताह जारी मानव विकास रिपोर्ट फिर से हमें आगाह करती है कि भारत की आर्थिक तरक्की का मतलब सभी भारतीयों के लिए बेहतर जिंदगी नहीं है। जीवन प्रत्याशा, शिक्षा, साक्षरता और जीवन स्तर जैसे विकास के कई संकेतकों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक भारत 128वें स्थान पर है। वर्ष 2000 में भी हम इसी स्थान पर थे।
सात सालों के दौरान मुल्क ने काफी तरक्की तो की है लेकिन मानव विकास के सूचकांक में हम एक सीढ़ी भी ऊपर नहीं चढ़ सके हैं। सबसे निचली पायदान के हम काफी करीब हैं। रिपोर्ट उसी बात की पुष्टि करती है जो हम पहले से जानते हैं- दो भारत के बीच की खाई बहुत चौड़ी है, और जब तक इस दूरी को हम नहीं पाटते, सुपरपावर बनने का हमारा दावा, सिर्फ दावा ही रहने वाला है। इस बीच मानवाधिकारों के हनन के तमाम रिकॉर्डो के बावजूद चीन मानव विकास के मामले में बेहतर प्रदर्शन करते हुए 99 से 81वें मुकाम पर आ पहुंचा है।
विश्व की उभरती ताकतों में भारत के साथ ब्राजील का नाम भी लिया जाता है, जिसने इसी अवधि में अपनी रैंकिंग चार अंकों से बेहतर बनाई है। विकसित पश्चिमी देशों के साथ भारत की तुलना बेमानी होगी, मगर रिपोर्ट से जाहिर है कि बराबरी के मुल्कों के मुकाबले भी हम नहीं टिकते। दुर्भाग्य से रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि आर्थिक प्रगति और मानव विकास सूचकांक अनिवार्य रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी और कनाडा जैसी सभी महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था वाले देशों की रैंकिंग इस दौरान घटी है जबकि उनकी आर्थिक सेहत में कोई गिरावट नहीं है। दरअसल, भारत को बांग्लादेश जैसे मुल्क से सीख लेने की जरूरत है जो गरीबी की उच्च दर और राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद सात वर्षो में छह स्थान ऊपर आया है।