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ऐसे नहीं खत्म होगी जाति व्यवस्था

दृष्टिकोण. मौजूदा दौर में भारत में जाति व्यवस्था दबाव में है। शहरीकरण और बाजारवादी ताकतों ने इस व्यवस्था को काफी हद तक झिंझोड़कर रख दिया है। इसके ऐसे नहीं खत्म होगी जाति व्यवस्थाबावजूद यह अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए समय के साथ तालमेल बैठाने और खुद को बदलने के प्रयास कर रही है। इस बात का संकेत पिछले रविवार को मुंबई में हुई बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती की रैली से मिलता है। इस रैली में मायावती ने जाति व्यवस्था का खात्मा करने का आह्वान करने की बजाय सभी जातियों से एक छाते के नीचे आने की अपील की।

उत्तरप्रदेश में सर्वजन फार्मूले की बदौलत सत्ता में आई मायावती अब दूसरे राज्यों में पैर पसारने की कोशिश कर रही हैं। इनमें महाराष्ट्र प्रमुख है। मायावती बाकी सभी जातियों को दलित नेतृत्व के नीचे लाना चाहती हैं। कांग्रेस भी लंबे अरसे तक इससे मिलता-जुलता फामरूला सफलतापूर्वक आजमाती आई है। उसके फामरूले में नेतृत्व ऊंची जातियों के पास रहता था और दलित तथा मुस्लिम वोट बैंक के रूप में काम करते थे। कांग्रेस का यह फामरूला जाति व्यवस्था को तोड़ पाने में नाकाम रहा, इसलिए अब यह मानने का कोई कारण नहीं है कि मायावती दलितों को नेतृत्व की भूमिका देकर ऐसा कर सकती हैं। अपने देश में जाति समूहों के समीकरणों की मदद से सत्ता हासिल करना असल में काफी पुराना फामरूला है।

साथ ही साथ जातियों की एकजुटता पर निर्भर हरेक गठजोड़ की मजबूती की अपनी स्वाभाविक सीमाएं हैं। यदि मायावती विभिन्न जाति समूहों को अपने लाभ के लिए जोड़ सकती हैं तो फिर दूसरी पार्टियां भी ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं? आखिर मुलायमसिंह की समाजवादी पार्टी या फिर भारतीय जनता पार्टी भी तो जातियों-समुदायों का ऐसा गठजोड़ बना सकती हैं जिनके सहारे वे सत्ता में पहुंच सकें। स्वाभाविक है कि मायावती के हाथों एक-दो बार पराजित होने के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी भी उन्हीं के फामरूले को अपनाने का प्रयास करें। हालांकि मायावती के फामरूले के आगे भी सफल होने पर संदेह किया जा सकता है मगर उनकी राजनीतिक बाध्यताओं के चलते चुनावों में जातियों को नया जीवन मिल गया है। इसी के साथ यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या हमेशा के लिए जातियां इतनी महत्वपूर्ण बनी रहेंगी।

मुझे लगता है कि अपने स्वरूप में थोड़ा-बहुत बदलाव लाकर जातियां विभिन्न दौरों में अपना अस्तित्व बनाए रखेंगी। जिस तरह पूंजीवाद ने कल्याणकारी राज्य का माडल अपनाकर न केवल अपना अस्तित्व बचाए रखा बल्कि फला-फूला भी है उसी तरह जाति व्यवस्था भी फलती-फूलती रहेगी। इसका सीधा-सादा कारण है : जाति तथाकथित ऊंची जाति के लोगों द्वारा अन्य जातियों के दमन के लिए बनाई गई व्यवस्था भर नहीं है। यह हरेक व्यक्ति को उसकी जाति विशेष के भीतर मजबूती प्रदान करने की प्रणाली है और इसी वजह से यह टिकाऊ बनी हुई है। पचास और साठ के दशक में लंबे समय तक भारत में रहे मेक्सिको के नोबेल पुरस्कार विजेता कवि और लेखक ओक्टिवो पाज ने लिखा भी है कि जाति सामाजिक व्यवस्था में किसी समूह विशेष का स्थान तय करने वाली व्यवस्था भर नहीं है। उनका मानना है, ‘दो हजार सालों से भी ज्यादा समय तक यह व्यवस्था इसलिए टिकी रही है कि यह धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, क्षेत्रीय, भाषाई और पारिवारिक संबंधों का ताना-बाना है।’

विडंबना है कि जो बात हमें सहज बुद्धि से समझ लेनी चाहिए थी वह बात हमें एक विदेशी व्यक्ति ने बताई है। आप जाति को महज एक सामाजिक बुराई बताकर खारिज नहीं कर सकते हैं। वह इसके अलावा भी बहुत-कुछ है। यह असल में बदलाव का प्रतिरोध करने और अपने समूह के लोगों को स्थायित्व प्रदान करने वाली स्वयं पर आधारित एक व्यवस्था है। इसे समाप्त करने के लिए आपको एक ऐसी नई संरचना बनानी होगी जो व्यक्तियों और समूहों को जाति के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलने में मदद कर सके।

ऐसा करने के लिए कारोबार के क्षेत्र का एक उदाहरण देखा जा सकता है। नब्बे के दशक के शुरुआती सालों तक देश के सबसे प्रमुख शेयर बाजार-बंबई शेयर बाजार का कामकाज एक क्लब की तरह चलता था। इसके ज्यादातर सदस्य एक ही समुदाय के थे। वे आपस में शेयरों की खरीद-फरोख्त करते थे, खुद ही साजिश रचते थे और यदि उनमें से कोई किसी समस्या में उलझ जाता तो उसकी समस्या का समाधान भी तलाशते थे। नतीजतन, उन पर निवेशकों का भरोसा टूटने लगा था और निवेशक शेयर दलालों को धोखेबाज मानने लगे थे। उसी दौर में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज अस्तित्व में आया। उसका कहना था, ‘हम ऐसे क्लब की परवाह नहीं करते जो निवेशकों के हितों को नहीं साधता हो। हम ऐसी प्रणाली उपलब्ध कराएंगे जो पारदर्शी होगी और निवेशकों के हितों को पूरा करेगी।’ कुछ ही सालों में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने बंबई शेयर बाजार को पीछे छोड़ दिया। और आज बंबई शेयर बाजार को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के नक्शेकदम पर चलना पड़ रहा है। नतीजतन, कुछ लोगों का क्लब एक विशाल संस्था में तब्दील हो चुका है।

यह कहना सरासर बेवकूफी होगी कि देश को गढ़ने-बनाने का काम एक शेयर बाजार को पारदर्शी बनाने के काम की तरह आसान है फिर भी इसके लिए जरूरी ढांचा मिलता-जुलता है : मजबूत संस्थाएं, कानून का शासन और जागरूक नागरिक तथा मीडिया। दुर्भाग्य से हमारे राजनेता संस्थाओं को तोड़ने के काम में व्यस्त रहते आए हैं। संसद की गरिमा का काफी हद तक क्षरण हो चुका है। निचले स्तर की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की जड़ें गहराई तक जम चुकी हैं। बहुत से राज्यों के पुलिस बल का बड़ा हिस्सा अपराधियों से सांठ-गांठ के लिए पहचाना जाता है। मीडिया भी अक्सर हृदयहीन होकर काम करता है। ऐसे में आम लोगों के पास कोई विकल्प नहीं बचा रहता और वे बाध्य होकर पुरानी-आजमाई हुई जाति व्यवस्था की ओर लौटते हैं। तो फिर क्या करना होगा? वैकल्पिक संस्थाएं खड़ी कीजिए, जाति व्यवस्था अपने आप ढह जाएगी।





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