सम्पादकीय. वन एवं वन उत्पादों पर वनवासियों के परंपरागत अधिकारों को मान्यता देने संबंधी विधेयक को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल जाने के बाद लगभग एक साल का वक्त बीत जाने के बावजूद उसे कानून के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है। लोकसभा में यह मुद्दा उठाए जाने पर संसदीय कार्य मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी द्वारा दिए गए जवाब से संबंधित कानून के शीघ्र अधिसूचित किए जाने की उम्मीद जगी है, फिर भी यह मामला सरकार से अतिरिक्त संवेदनशीलता दिखाए जाने की अपेक्षा करता है।
हालांकि वन संपदा पर अधिकार संबंधी अन्य विभिन्न कानूनों के रहते नया कानून वनवासियों के हितों की कितनी पूर्ति कर पाएगा, यह स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह संबंधित कानून का यह प्रावधान है कि पहले से लागू अन्य तमाम कानून इससे प्रभावित नहीं होंगे जबकि ऐसे कानूनों की वजह से ही लाखों वनवासियों को अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ा है और कुछ मामलों में विस्थापित भी होना पड़ा है।
अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकारों को मान्यता अधिनियम 2006 में सारे अधिकार ग्राम सभाओं में निहित करने की बजाय वन विभाग को दिए जाने का प्रावधान किए जाने से वनवासियों की समस्याएं कम होने की बजाय बढ़ने के ही आसार हैं। वन अमले की कार्यशैली को करीब से जानने-समझने वालों का तो यही मानना है कि वह प्राय: वनवासियों के हितों के विपरीत काम करता है। इस कारण जब तक वन विभाग के अमले की कार्यशैली में गुणात्मक बदलाव नहीं आता तब तक नए कानून के प्रभावी अमल पर भी सवालिया निशान लगे रहेंगे।
इसके साथ ही एक समस्या खतरे में पड़े वन्यप्राणियों से संबंधित है। वन्य-प्राणियों के संरक्षण के लिए कार्यरत विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि कई बार अवैध शिकारी वनवासियों की मिलीभगत से शिकार करते हैं और वन्य प्राणियों को बचाने के लिए कुछ इलाकों को मानव गतिविधियों से मुक्त किया जाना भी जरूरी है। ऐसे वनवासियों के पुनर्वास के लिए कितने भी लुभावने पैकेज क्यों न दे दिए जाएं पर अनुभव बताता है कि एक बार अपनी भूमि से उखड़ने के बाद वे कहीं के नहीं रहते। ऐसे वनवासियों को यह कानून शायद ही कोई संरक्षण दे सके। तमाम समस्याओं के बावजूद संबंधित कानून को अधिसूचित किए जाने में विलंब नहीं किया जाना चाहिए। कानून के अधिसूचित हो जाने के बाद वन संपदा से संपन्न विभिन्न राज्यों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बिना देर किए वनवासियों को इसके लाभ पहुंचाएं और अमल में आने वाली समस्याओं के समाधान के उपाय भी तलाशें।