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अनिल कपूर बनाएंगे राज कपूर पर फिल्म

परदे के पीछे. अनिल कपूर की सुपुत्री सोनम को लोगों ने ‘सावरिया’ में पसंद किया है और 90 लाख के मेहनताने पर राकेश मेहरा ने उन्हें फिल्म ‘दिल्ली 6’ के अनिल कपूर बनाएंगे राज कपूर पर फिल्मलिए अनुबंधित किया है। अनिल को 90 लाख के मेहनताने तक पहुंचने के लिए अनेक वर्ष तक इंतजार करना पड़ा था। ‘राम लखन’ तथा ‘तेजाब’ की सफलता के बाद ही वे मुंहमांगा धन पा सके, परंतु सोनम को असफल ‘सावरिया’ के बाद ही उतना धन मिल रहा है। फिल्म उद्योग में मेहनताने का कोई गणित ही नहीं रह गया है। ‘मांग’ इतनी अधिक है और ‘सप्लाई’ इतनी कम है कि योग्यता या दर्शक को आकर्षित करने की शक्ति अब मेहनताने के निर्धारण के मानदंड ही नहीं रह गए हैं। यह भी गौरतलब है कि अनिल कपूर अपने शिखर दिनों में 10 लाख से जो फ्लैट खरीद सकते थे, उस तरह का फ्लैट सोनम 90 लाख में नहीं खरीद सकतीं गोयाकि जमीन और सितारों दोनों के ही भाव आसमान छू रहे हैं।

बहरहाल अनिल कपूर अपने महात्मा गांधी पर बनाए गए हादसे के बाद राज कपूर के जीवन पर फिल्म बनाने का विचार कर रहे हैं। जीवन कथाओं पर फिल्म बनाने के क्षेत्र में वे महारत हासिल करना चाहते हैं। उनके पिता सुरेंद्र कपूर ने पृथ्वी थिएटर के बाद गीता बाली और शम्मी कपूर के सचिव के रूप में काम किया था और राज कपूर के नजदीकी दोस्त और पड़ोसी भी थे। दोनों परिवारों में घनिष्ठता रही है। एक दौर में राज कपूर तीन नायक वाली फिल्म ‘परमवीर चक्र’ बनाना चाहते थे और इसमें अनिल को बतौर नायक प्रस्तुत करना चाहते थे। इस फिल्म के लिए अनिल ने कैडेट का प्रशिक्षण भी लिया था। फिल्म नहीं बन सकी और बोनी कपूर ने अपने छोटे भाई अनिल को दक्षिण के निर्देशक बापू के साथ ‘वो सात दिन’ में प्रस्तुत किया। इसके पूर्व अनिल सथ्यू की कला फिल्म ‘कहां कहां से गुजर गया’ में काम कर चुके थे।

राज कपूर दर्शक की स्मृति में इतने ताजे हैं कि उनकी भूमिका कोई भी अभिनेता करे, वह अस्वीकृत हो जाएगा। इसी तरह नरगिस और वैजयंतीमाला के चरित्र निभाने वाली राज कपूर महिलाएं भी अस्वीकृत हो जाएंगी। आप राज कपूर के जीवन चरित्र को सामने रखकर एक युवा महत्वाकांक्षी फिल्मकार की कथा बना सकते हैं। 7 दिसंबर को प्रदर्शित होने वाली सुधीर मिश्रा की ‘खोया खोया चांद’ में यही किया गया है। आप आज दादा साहेब फाल्के के जीवन चरित्र पर फिल्म बनाएं तो उनके रूप में किसी भी कलाकार को स्वीकार किया जाएगा, क्योंकि फाल्के साहब की कोई छवि दर्शक के मन में नहीं है। सिनेमा में छवि का बहुत महत्व है, क्योंकि दर्शक के अवचेतन में वह स्थापित हो जाती है। सिनेमा छवियों और छायाओं का अवास्तविक संसार है और दर्शक के अवचेतन में हकीकत के पर्याय के रूप में स्थापित होता है। इनके भावनात्मक तादात्म्य पर मनोरंजन उद्योग आधारित है।

राज कपूर की सबसे अधिक महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ आत्म-कथात्मक फिल्म के रूप में प्रचारित हुई थी और यही प्रचार घातक सिद्ध हुआ। दरअसल ‘जोकर’ राज कपूर की छवि की कथा कहती है, न कि व्यक्ति राज कपूर की। फिल्म में तीन असफल प्रेम प्रसंग थे- पहला आयु का अंतर, दूसरा भाष और देश के अंतर के कारण विफल रहे और तीसरे की नायिका स्वार्थी और महत्वाकांक्षी थी। यथार्थ जीवन में राज कपूर के प्रेम प्रकरण इन कारणों से असफल नहीं हुए थे।

बहरहाल, राज कपूर के पुत्र इस तरह की फिल्म की इजाजत नहीं देंगे और न ही नरगिस की बेटियां इसे बनने देंगी। काश! महात्मा गांधी के परिवार से कोई अनिल की गांधी पर बनी फिल्म को रोक पाते। दरअसल फिल्मकारों के पास विषय नहीं हैं। अत: इस तरह की बातों को वे टटोलते हैं।





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