बीकानेर. कलेक्ट्रेट के सामने गुरुवार को जुटे सैकड़ों किसानों के चेहरे पर गुस्सा इस कदर था कि सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो गए। एक स्वर में
किसानों ने केन्द्र व राज्य सरकार से मुकाबला करने का संकल्प लिया। ये किसान बिना किसी पार्टी व बैनरतले सेना के संयुक्त शस्त्र प्रशिक्षण के लिए अवाप्त होने वाले गांवों का विरोध कर रहे थे। पूर्व प्रधान दानाराम भांभू ने कहा कि बुजुर्गो की मेहनत से बनाए घर आसानी से नहीं उजड़ने देंगे।
इन घरों व खेती से उनके परिवार का अस्तित्व ही नहीं जुड़ा बल्कि उनकी यादें भी इन्हीं में समाहित हैं। यदि सरकार नहीं मानी तो नंदीग्राम से भी बड़ा आंदोलन होगा। अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अवाप्ति के लिए प्रस्तावित 56 गांवों के सैकड़ों किसानों के साथ उनके बच्चे और महिलाएं भी थी। किसानों का विरोध इतना तेज था कि मंच पर जो वक्ता भूमि के बदले मुआवजे की बात करता उसे किसान नीचे बुला लेते। बीच में एक किसान उठकर मंच पर आया और कहा जो भी वक्ता मुआवजे की बात करेगा वह कृपया यहां से चला जाए। किसानों के गुस्से को भांप अन्य वक्ता भी संभलकर बोल रहे थे। सरकार को अभी यह बात समझ लेनी चाहिए वरना आगे की स्थिति नियंत्रण से बाहर होगी।
किसानों के स्वर में स्वर मिलाते हुए लूणकरणसर विधायक वीरेन्द्र बेनीवाल ने कहा कि किसानों की ताकत के आगे सरकार को झुकना ही होगा। उन्होंने सुझाव दिया सरकार जहां अवाप्त होने वाले गांवों के किसानों को बसाना चाहती है वहीं सेना का प्रशिक्षण केन्द्र स्थातिप कर दे। उन्होंने कहा कि किसानों की लड़ाई को अब अंजाम दिए बगैर वे चुप नहीं बैठेंगे। इसके लिए जितना भी संघर्ष करना पड़े वे करेंगे। जिला प्रमुख रामेश्वर डूडी ने इसे राज्य सरकार की मंशा बताते हुए कहा कि अवाप्ति के लिए एनओसी नहीं देनी चाहिए थी।
लूणकरणसर प्रधान रूपाराम कुल्हरिया ने भी किसानों से कहा कि अगर सरकार नहीं मानी तो वे लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहें। किसानों को बीकानेर प्रधान तुलसीराम मूंड, कतरियासर सरपंच रघुनाथ सिद्ध, भोमराज आर्य, मोतीलाल लेघा, भागीरथ मान सहित अनेक वक्ताओं ने संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता केला के पूर्व सरपंच हाजी शेर मोहम्मद ने की। बाद में विधायक बेनीवाल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल कलेक्टर से मिला और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौपा।
ये हैं अवाप्त होने प्रस्तावित 56 गांव : छत्तरगढ़ तहसील के अंतर्गत गौरीसर, सादोलाई, राजासर भाटियान, कुण्डा,नापासरिया, अंबारन, मोतीगढ़, केला, सरदारपुरा, महादेववाली, बास करणीसर, छत्तरगढ़ बारानी, सत्तासर बारानी, चक एक व दो एडब्ल्यूएम, चक तीन डीओएल, चक दो व पांच एसटीएम गांव प्रस्तावित हैं। लूणकरणसर तहसील के सौढवाली, हाफासर, अजीतमाना, करनाली, लखावर, शोभोलाई, खोखराणा, बीरमाना, रतनपुरा उर्फ भोबिया, डूडीवाली, मूसलकी, बींझरवाली, मकडसर, भादवा, खिलेरिया, अलौदा, डूडी मुकलेरा के अलावा बीकानेर तहसील के जालवाली, नूर मोहम्मद की ढाणी, नूरसर, कालासर, सवाईसर, डेहर जोगरान, लाखूसर, मेहरासर, भैरूखीरा, भैरूपावा, अकड़ियावाला, धोलेरा नंबर एक व दो, शरह धोलेरा, धोलेरा हिस्सा मगजी व पेमजी, हरखासर बागोडान गांव शामिल हैं।
इसके अलावा पूगल तहसील के करणीसर भाटियान, बरजू, बराला, दीनसर गांव के अलावा उपनिवेशन विभाग के भणातवाला, रामसर छोटा, बांदरावाला,सूरासर व सियासर पंचकोसा सेना के संयुक्त शस्त्र प्रशिक्षण के लिए अवाप्त होने के प्रस्तावित हैं। गौरतलब है कि सरकार ने पहले 62 गावों को अवाप्त करने का निर्णय किया था लेकिन उसमें से छह गांव को अवाप्ति होने से मुक्त कर दिया है।
* खेती से बच्चों का पेट पल रहा है। यदि गांव उजड़ गए तो अन्य जगह बसने में सालों लग जाएंगे। सरकार के पास बदले में देने के लिए जमीन नहीं है। यदि होती तो वे उन्हें न उजाड़कर प्रशिक्षण केन्द्र वहीं स्थापित करती। ये किसानों के साथ छलावा है। हम हर स्तर पर इसका विरोध करेंगे।
नारायणराम, खिलेरी
* घर में कोई कार्य होता है तो छोटे-बड़ों से सलाह ली जाती है लेकिन सरकार ने उन्हें उजाड़ने का निर्णय चुपचाप कर लिया। किसान इसे कैसे बर्दाश्त करेगा। खेत और घर उनके बुजुर्गो की निशानी है। जीवित रहते इस निशानी को हम मिटने नहीं देंगे। मरने के बाद कौन देखता है।
मियाराम, लूणकरणसर
* सरकार प्रशिक्षण केन्द्र के लिए गांव को अवाप्त के बदले मुआवजे का प्रलोभन दे रही है लेकिन पूर्व में ही अवाप्त किए गए विस्थापित दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। सरकार से विश्वास उठ चुका है। किसी भी सूरत में जमीन नहीं देंगे। इसके लिए जो करना पड़े, वह सब करूंगा।
कुंभाराम, ढोलेरा
* मैं मानता हूं कि सेना के लिए जमीन की जरूरत है लेकिन क्या किसानों को उजाड़कर ही सेना को जमीन मिल सकती है। ऐसी कई जमीने है जिस पर प्रशिक्षण केन्द्र बन सकता है। सरकार किसान और सेना को आमने-सामने कर रही है। किसान इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेगा।
रेवंतराम, खिलेरिया
* अब मामला भले ही केन्द्र सरकार के पाले में है लेकिन प्राथमिकतौर पर राज्य सरकार ने गलती की है। सरकार को इस जगह की बजाय अन्यत्र एनओसी देनी चाहिए थी। प्रदर्शन के लिए बीजेपी के नेताओं को आमंत्रित किया गया था लेकिन वे इस लायक नहीं हैं कि किसानों को चेहरा दिखा सकें फिर भी हम केन्द्र पर दबाव बनाएंगे।
रामेश्वर डूडी, जिला प्रमुख
* सेना के लिए भूमि दी जानी चाहिए लेकिन सरकार को एनओसी देने से पहले स्थानीय प्रतिनिधि व किसानों को विश्वास में लेना चाहिए था। बिना किसानों की सलाह के एनओसी दे दी। इससे किसान भड़क गए। अब केन्द्र से बातचीत करेंगे और किसानों को उजड़ने नहीं देंगे।
वीरेन्द्र बेनीवाल, विधायक लूणकरणसर
अवाप्त होने वाले क्षेत्र के तथ्य
सेना के संयुक्त शस्त्र प्रशिक्षण केन्द्र के लिए जिन 56 गांवों को अवाप्त किया जाना प्रस्तावित है उसमें कुल दो लाख 23 हजार 224 हैक्टेयर (लगभग नौ लाख बीघा)भूमि है। यहां 4224 बीपीएल परिवारों को मिलाकर नौ हजार 387 परिवार हैं। यहां निवास करने वाले करीब 50 हजार लोग हैं। इससे कई गुना अधिक पशुधन है। ये इंदिरा गांधी नहर के नजदीक हैं जहां बिजली-पानी की सुविधा भी है। प्रति वर्ष यहां 400 करोड़ रुपए का औसत उत्पादन होता है। 25 करोड़ रुपए का चारा उत्पादन, 100 करोड़ रुपए जलाऊ लकड़ी का उत्पादन होता है।