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मनचाहा वर देते हैं कालभैरव

पानीपत. कालभैरव शिव के अवतार हैं, लेकिन मां दुर्गा के साथ इनका गहरा नाता है यह मां की सेना के प्रधान सेनापति हैं। जब शिव ने आदि शक्ति को अपनी शिवा शक्ति से समाहित किया तो उस वक्त शिवजी ने कालभैरव को मां के साथ रहने का आदेश दिया।

मां के गणों में काल भैरव सबसे शक्तिशाली थे। इनकी नजर भर से बड़े-बड़े दानव प्राण खो बैठते थे। जहां-जहां मां का मंदिर है वहां काल भैरव का मंदिर अवश्य होता है। लोग मां के दर्शन के बाद काल भैरव की आराधना अवश्य करते हैं। यह शिव के अवतार होने के कारण शिव की तरह बहुत कम आराधना में ही प्रसन्न हो जाते हैं और मनचाहा वर देते हैं। इनके दरबार में लगाई गई गुहार खाली नहीं जाती।

देवी की आराधना करते समय इन्हें भूल जाया जाएं, तो यह सबसे पहले देवी से नाराज होते हैं कि मैया, अपने भक्त को तूने मेरे बारे में क्यों नहीं बताया। मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को दोपहर के समय इनका जन्म हुआ इसलिए इसे काल भैरवाष्टमी कहते हैं। इस दिन व्रत करने से पापों से मुक्ति मिलती है और मृत्यु का भय मिट जाता है। भैरव कर्मकांड पसंद नहीं करते इसलिए अगर सिर्फ हाथ जोड़कर सच्चे मन से उनका स्मरण भी कर लेंगे तो भी ये प्रसन्न हो जाते हैं।





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