HomeVichaar Vichaar

मलेशिया से अशुभ संकेत

दृष्टिकोण. विदेशों में रहने वाले भारतवंशियों और अनिवासी भारतीयों की तादाद बहुत बड़ी है। वे विभिन्न समुदायों, धर्मो और नस्लों से ताल्लुक रखते हैं। अपनी पसंद के किसी देश या समाज का हिस्सा बन जाने के बाद कभी-कभार वे बेहतर मानव या नागरिक अधिकारों के लिए मांग उठाने की जरूरत महसूस करते हैं, खासकर रोजगार और अवसरों के संदर्भ में।

जब तक ये मांगें लोकतांत्रिक और वैध तरीकों से उठाई जाती हैं तब तक इन पर कोई विवाद नहीं होता। भारत में रहने वाले लोगों और विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच एक तरह का जुड़ाव है कि हम सच्चाई तक भूल जाते हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स का ही उदाहरण लें। हम उन्हें बार-बार भारत की बेटी के रूप में संबोधित करते हैं जबकि वह अमेरिका की नागरिक हैं। इसी तरह हम बॉबी जिंदल को भी भारतीय समझने की चूक करते हैं जबकि वह अमेरिका में जन्मे और पले-बढ़े हैं।

हालांकि यह सब कहने का तात्पर्य विदेशों में रहने वाले भारतवंशियों के इस आरोप से ध्यान हटाना नहीं है कि उनके साथ स्थानीय प्रशासन भेदभाव बरतता है। हमें आज भी याद है कि ईदी अमीन के शासनकाल में उगांडा से भारतवंशियों को किस तरह खदेड़ा गया था। कुछ साल बाद वहां सत्ता परिवर्तन होने पर भी ये भारतवंशी वहां नहीं लौट सके। विभिन्न देशों में रह रहे लाखों भारतवंशी आज भी भारत से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं और इस वजह से वे भारत सरकार से मदद, समर्थन और सहानुभूति की अपेक्षा भी करते हैं। मलेशिया में बसे भारतवंशी फिलहाल ऐसा ही कर रहे हैं।

पिछले रविवार को हिंदू राइट्स एक्शन फोर्स के बैनर तले कुआलालंपुर में हुई 10 हजार से ज्यादा भारतवंशियों की रैली के पीछे मलेशिया में रह रहे भारतवंशियों की यह शिकायत थी कि मलेशिया सरकार की नीतियों की वजह से उन्हें अच्छे रोजगार नहीं मिल रहे हैं और उनके बच्चे अच्छी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। मलेशिया सरकार ने इस रैली को गैर-कानूनी और राष्ट्र-विरोधी करार देकर रैली में शामिल लोगों को तितर-बितर किया और दर्जनों को गिरफ्तार भी किया। एक अधिकारी ने रैली के आयोजकों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाए जाने तक की बात कही है।

संयोग से मलेशिया में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अब तक खास प्रगति नहीं हुई है। वहां स्कूली शिक्षा भर की ही ठीकठाक व्यवस्था है। मलेशिया की नीतियों की वजह से गैर-मलय छात्रों को उच्च शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश मिलने में खासी दिक्कतें आती हैं। मलय छात्रों के लिए 2002 तक लागू आरक्षण की व्यवस्था समाप्त किए जाने के बावजूद स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में गैर-मलयों के प्रवेश के नियम कड़े होने के कारण चीनी मूल के छात्रों ने इनसे पहले ही मुंह मोड़ लिया है पर भारतवंशी छात्र अभी भी इन्हीं विश्वविद्यालयों में प्रवेश की इच्छा रखते हैं। मलेशिया पर चीन, भारत और ब्रिटेन का अच्छा खासा प्रभाव रहा है। उपनिवेशवाद के दौर में रबड़ बागानों में काम करने के लिए ब्रिटिश बड़ी तादाद में भारतीयों को वहां ले गए थे। भारत और चीन के आर्थिक शक्तियों के रूप में उदय के मद्देनजर मलेशिया भी प्रतिस्पर्धा के नए अवसरों की तलाश में है। ऐसे माहौल में नस्ल आधारित भेदभाव को ज्यादा समय तक स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

इस मसले पर संसद में मांग उठी कि सरकार को मलेशिया के समक्ष यह मसला तत्काल उठाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने मलेशिया में भारतवंशियों के उत्पीड़न पर नपी-तुली टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कभी दुनिया के किसी हिस्से में भारतीय संकट में होते हैं तो सरकार के लिए यह निश्चित रूप से चिंता का विषय होता है, लेकिन यहां सवाल भारतीयों के सिर्फ संकट में होने का नहीं, बल्कि उन भारतीयों के मानव और नागरिक अधिकारों का भी है, जो गैर मुस्लिम हैं और एक ऐसे देश में रह रहे हैं, जो आधिकारिक रूप से इस्लामिक है। न केवल मलेशिया, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात में भी भारतीयों से र्दुव्‍यवहार और उनके भयावह जीवन हालात की छिटपुट दास्तान समय-समय पर आती रहती है।

विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में बयान देते हुए कहा कि सरकार विदेशों में रह रहे भारतवंशियों के कल्याण को लेकर गहरी चिंता रखती है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के बारे में मलेशिया के एक मंत्री की आपत्तिजनक टिप्पणियों का मामला वे मलेशिया के समक्ष जरूर उठाएंगे।

अब परेशानी पैदा करने वाली खबरें ये आ रही हैं कि भारत की प्रतिक्रिया से नाराज भारतवंशी, खासकर तमिल हिंदू लिट्टे की ओर मुड़ सकते हैं। जबकि लिट्टे भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन है। इस परिदृश्य में डीएमके और पीएमके की प्रतिक्रिया गंभीर चिंता का विषय है। उधर, सरकार अजीब स्थिति में फंस गई है। मलेशिया इस्लामिक देश होने के बावजूद भारत का मित्र है। ऐसे में सरकार उसे नाराज करने के मूड में नहीं है, लेकिन वह घरेलू मोर्चे पर तमिलों की अनदेखी करके चुप भी नहीं रह सकती।

मलेशिया की 60 फीसदी आबादी मलय है, 25 प्रतिशत चीनी और फिर लगभग नौ प्रतिशत भारतीय हैं। मलय नागरिकों को लाभ पहुंचाने वाली आर्थिक नीतियों से कई अल्पसंख्यक चीनी और भारतीयों का मोह भंग हुआ है। मलय समुदाय को दी गई सुविधाएं अचानक से वापस नहीं ली जा सकतीं इसलिए नस्लीय पहचान के आधार पर अधिकारों को अलग करने का मामला जोर पकड़ रहा है।

1957 में अंग्रेजों के मलेशिया छोड़ते समय तैयार किए गए मलय संघ के संविधान में इस बात का उल्लेख किया गया है कि स्थानीय मलय समुदाय को उनकी बदतर आर्थिक हालत के मद्देनजर सरकारी नौकरियों में आरक्षण, व्यापार के लिए परमिट और विश्वविद्यालय में प्रवेश सहित विशेष सहायता की जरूरत है। आजादी के बाद से ही यह व्यवस्था जारी है। भारत में मौजूद मलेशिया के अधिकारी इस बात से साफ इंकार करते हैं कि भारतीयों के साथ किसी तरह का भेदभाव वहां होता है।

अधिकारियों ने रविवार के संघर्ष को सांप्रदायिक रूप देने के लिए मीडिया को दोषी ठहराया है। खबर यह भी है कि इन घटनाओं के बाद मलेशिया में बसे भारतीय बड़ी तादाद में आस्ट्रेलिया जाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत जब दुनिया में अपनी मजबूत आर्थिक और सियासी हैसियत अर्जित करने जा रहा है ऐसे में भारतीय मूल के विस्तृत समुदाय की परेशानियां बर्दाश्त नहीं कर सकता।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: