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कंडोम विरोधी नीति पर पुनर्विचार कर सकता है चर्च

मुंबई.कंडोम का इस्तेमाल न करने के कारण एड्स की बीमारी से दुनिया भर में करोड़ों लोगों की मौत के बाद अब रोमन कैथोलिक चर्च अपनी कंडोम विरोधी नीति पर पुनर्विचार करने का मन बना रहा है। चर्च के सूत्रों का कहना है कि वेटिकन में एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया जा रहा है, जिसमें ‘कुछ मामलों’ में कंडोम के इस्तेमाल की अनुमति होगी।

उधर एक दिसंबर को विश्व एड्स दिवस की पूर्व संध्या पर भारत में कैथोलिक चर्च के सूत्रों का कहना है कि विवाहित दंपतियों को कंडोम के इस्तेमाल की अनुमति है।

सूत्रों ने बताया कि कंडोम के उपयोग को लेकर पोप जॉन पॉल द्वितीय के विरोधी रुख पर दो साल तक कायम रहने के बाद अब मौजूदा पोप बेनेडिक्ट 16वें ने वैचारिक बदलाव के संकेत दिए हैं।

कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) के स्वास्थ्य सचिव एलेक्स वैदकुंथल ने कहा, ‘एड्स की रोकथाम का सिर्फ एक उपाय है- कंडोम। हालांकि फिलहाल इसके उपयोग का मामला विवाहित दंपतियों पर ही छोड़ा गया है, क्योंकि हम ऐसा मानते हैं कि सभी को कंडोम के इस्तेमाल करने की छूट देने से गलत संदेश जाएगा।’

तेजी से बढ़ते एड्स रोगियों की संख्या को देखते हुए भारतीय कैथोलिक चर्च ने पूरे देश में दो दिसंबर को ‘एड्स संडे’ मनाने का निर्णय लिया है। देश में युवाओं को एड्स के बारे में जानकारी देने के लिए कैथोलिक एजूकेशनल एंड चैरिटी इंस्टीट्यूट प्रचार अभियान भी चलाएंगे। एड्स बीमारी के अफ्रीकी देशों से लेकर लैटिन अमेरिका और एशिया तक पैर पसारने के पीछे चर्च की कंडोम विरोधी नीति को जिम्मेदार माना जाता रहा है। इस नीति की संयुक्त राष्ट्र और कई स्वयंसेवी संगठनों ने भी आलोचना की है। चर्च का मानना है कि कंडोम जैसे अस्थाई साधनों के उपयोग की बजाय लोगों को यौन संबंधों के मामले में संयम और खुलेपन से बचने की आदत डालनी चाहिए।

बहिष्कार का सामना कर रहे स्वयंसेवकअमेरिका में एड्स रोधी टीके के प्रयोगात्मक परीक्षणों में हिस्सा ले रहे 1000 स्वयंसेवकों को परिवार और समाज की गलतफहमी के कारण उनके बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। सैन फ्रांसिस्को के जन स्वास्थ्य विभाग के डॉ. जोनाथन फुक्स ने बताया कि लोग इस गलतफहमी के शिकार हैं कि एड्स रोधी टीके को लगाने वाले स्वयंसेवक भी इस बीमारी के संक्रमण के शिकार हो गए हैं। सर्वेक्षण में कुल 5417 स्वयंसेवक हिस्सा ले रहे हैं।

एड्स से अनजान जी-7 देश संयुक्त राष्ट्र. ढाई दशकों में एड्स के शिकार होकर करीब तीन करोड़ लोग भले ही अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन औद्योगिक रूप से विकसित जी-7 देशों में इस बीमारी को लेकर लोगों की जागरूकता का आलम यह है कि तीन में से एक वयस्क को एचआईवी संक्रमण के बारे में न के बराबर जानकारी है। यह बात इप्सॉस नामक संस्था द्वारा 3500 से ज्यादा लोगों पर किए गए एक सर्वेक्षण में सामने आई है। सर्वेक्षण के आंकड़ों को शनिवार को विश्व एड्स दिवस पर यहां विस्तार से जारी किया जाएगा।



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