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Astro Speak Astro Speak वास्तु विज्ञान. घर में ईशान कोण में शंख की धातु आसन पर स्थापना और उत्तर में उसके धारा-मुख को रखना संपदा कारक है। शंख की यह स्थिति उसे रत्न सिद्ध
करती है। इससे परस्पर प्रेम और आरोग्य भी बढ़ता है। यदि इस पर रविवार को छोड़कर तुलसी चढ़ाई जाए तो अभीष्ट की सिद्धि होती है। मार्गशीर्ष जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपना स्वरूप कहा है, में इसकी स्थापना गुणकारी है।
घर में ईशानकोण बहुत महत्वपूर्ण है। इसे शिव का कोना भी कहा जाता है। इस दिशा में जलस्रोत बनाना और उसे नियमित रूप से पानी से भरे रखने से घर में सदैव संपदा की आवक बनी रहती है। ईशान कोण में ही पूजा स्थान होना जरूरी है। इस स्थान पर विष्णु, शिव आदि पूज्य देवताओं की स्थापना होनी चाहिए। यह घर में विद्या के निरंतर विकास व परिजनों के मानसिक संतुलन के लिए आवश्यक है। इस कोने में गंगाजल से भरे पात्र पर शंख की स्थापना शुभकारक है। पूजा के अवसर पर शंख ध्वनि पापों का नाश करने वाली है और वहां लक्ष्मी का निवास बताया गया है। ब्रrावैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में आया है— शंखशब्दो भवेद् यत्र-तत्र लक्ष्मीश्च सुस्थिरा॥
वास्तुग्रंथ मयमतम् में विष्णु और विष्णु के पार्षदों के पूजा स्थल के नीचे, भूमि में धातु निर्मित या प्राकृतिक शंख रखने का निर्देश है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि इस कोने में पूजा स्थान पर शंख, शालिगराम और तुलसी को नित्य रखना चाहिए। शिवपुराण की रुद्रसंहिता में कहा गया है कि इससे विष्णु प्रसन्न होते हैं और लक्ष्मी का आगमन होता है। गृहस्थ को शालिगराम और शंख पर तुलसी अवश्य रखना चाहिए। यह पति-पत्नी में दांपत्य प्रेम को बढ़ाने वाला है। यदि किसी घर में पति-पत्नी में बैर-विरोध रहता है तो वे शंख पर नियमित तुलसी चढ़ा सकते हैं। पूजा स्थल पर दो शंख नहीं होने चाहिए। पूजा करते समय नवीन तुलसी-दल को चढ़ाना प्रीति और आयुष्यवर्धक है। ऐसा ही उल्लेख देवीभागवत (9, 24, 92) में भी आया है।
दक्षिणावर्ती शंखसमृद्धि के लिए दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना और पूजा की भी मान्यता है। दक्षिणावर्ती शंख से आयु, यश व धन तीनों की प्राप्ति होती है— दक्षिणावत्र्तशंखस्तु कुर्यादायुर्यशो धनम्। इसी प्रकार ‘आह्न्किचार तत्व’ में कहा गया है कि दक्षिणावर्ती शंख के जल से यदि हरि की अर्चना होती है तो समस्त पापों-दोषों का निवारण होता है— दक्षिणावत्र्तशंखस्य तोयेन यो अच्चर्येद्धरिम्। सप्तजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ शंख को कभी भूमि पर नहीं रखें, यह कुष्ठकारक है— भूमौ शंख च संस्थाप्य कुष्ठं जन्मान्तरे लभेत्।