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उनकी कुर्सी की कीमत चुकाता है लोकतंत्र

अभिमत. भारत में राजनीति का मतलब है पंचायत, जिला परिषद, विधानसभा या संसद जैसे किसी भी स्तर पर, किसी भी तरह सत्ता अर्जित करना। राजनीतिक ताकत हासिल करने के अधिकार के स्वीकृत तरीके हमारा संविधान देता है- चुनाव में आधी से अधिक सीटें जीतने वाले दल या समूह को सत्ता मिलती है।

मगर सत्ता तक पहुंचने का यह रास्ता अब तेजी से बदलता जा रहा है। अपनी उपलब्धियां गिनवाकर या भविष्य के वादों के दम पर राजनीतिक दलों ने एक लंबे समय से लोगों से वोट की गुहार करने के तरीके को दरकिनार कर दिया है। अब पार्टियों के बाहुबली उनके लिए वोट सुनिश्चित करते हैं। इतना ही नहीं, वे मतदाताओं को यह संदेश भी दे देते हैं कि उन्हें वोट नहीं देने का नतीजा क्या होगा। ऐसे लोग अपना दबदबा बनाए रखने के लिए मार-पीट, तोड़-फोड़ से लेकर किसी की हत्या तक करने में भी नहीं झिझकते। लोग भी इन बातों के आदी होते जा रहे हैं। बदले में ऐसे ‘कार्यकर्ताओं’ को सभी तरह के गैरकानूनी धंधे करने का लाइसेंस मिल जाता है।

हालांकि सभी राजनीतिक पार्टियां यह तरीका नहीं अपनातीं, मगर कई दलों को इससे कोई परहेज नहीं है। बड़ी पार्टियों के कुछ उम्मीदवारों को भी यही तरीका रास आता है। खासतौर पर देश के कुछ उत्तरी राज्यों में राजनीति का यह मंजूरशुदा रिवाज बन चुका है। आमतौर पर ऐसे माहौल में हारता वही है जो प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले बाहुबल में कमजोर हो। ऐसी स्थिति में पराजित प्रत्याशी के योद्धा या तो भाग खड़े होते हैं या विजयी दल के खेमे में शामिल हो जाते हैं।

समय आ चुका है कि राजनीतिक पार्टियां गंभीरता से इस बात पर विचार करें कि सत्ता का उनका मोह देश के आम आदमी को कहां ले आया है। इस तरह के लोकतंत्र की कीमत गरीबों और कुछ हद तक मध्यम वर्ग को चुकानी पड़ती है। ऐसी सत्ता का मूल्य चुकाने वाले सभी देशवासी होते हैं।





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