दृष्टिकोण. 26 जुलाई 2006 की शाम 34 बरस के सुनील वर्मा ने भोपाल में अपने घर की छत के कुंदे में फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली। इस घटना के 21 साल
से भी ज्यादा पहले 2-3 दिसंबर 1984 की रात सुनील के माता-पिता और पांच भाई-बहन हत्यारी गैस की चपेट में आ गए थे। उस रात यूनियन कार्बाइड के कारखाने से रिसे मिथाइल आइसोसाइनेट, हाइड्रोजन साइनाइड, मोनोमिथाइलएमीन और कार्बन मोनोआक्साइड गैसों के जहरीले मिश्रण ने 10 लाख की आबादी वाले शहर में कहर बरपाया था। गैस जिन बस्तियों में सबसे पहले पहुंची उनमें जेपीनगर भी थी।
सुनील और उसका परिवार इसी बस्ती की एक झुग्गी में सोया हुआ था। अचानक नींद खुली तो परिवार के सदस्यों ने पाया कि उन्हें सांस लेने में कठिनाई हो रही है, आंखें बुरी तरह जल रही हैं। खांसते-खखारते और चीखते-पुकारते वे घर से बाहर निकले, तो उन जैसे सैकड़ों बदहवास लोग इधर-उधर भाग रहे थे। तब महज 12 बरस का रहा सुनील भी छोटी बहन ममता का हाथ थामकर बदहवास लोगों के साथ भागने लगा। यूनियन कार्बाइड से निकली गैस के बादलों में वह परिवार के दूसरे सदस्यों से बिछुड़ गया। अचानक ममता का हाथ भी उससे छूट गया। सब तरफ चीख-पुकार करते लोगों का हुजूम था। इनमें से कुछ एक-दूसरे पर गिरे और कुचले जा रहे थे, कुछ अपने कपड़े फाड़ रहे थे और कुछ बेतहाशा उलटियां कर रहे थे।
जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहा सुनील आखिर में एक मेटाडोर में बैठकर एक सुरक्षित जगह पहुंचा। बाद में परिवार के दूसरे सदस्यों ने मिलने पर उसे बताया कि उसकी मां उसके आठ माह के छोटे भाई संजय को थामे हुए ही मौत के आगोश में चली गई थी। संजय के पिता दूसरे दिन सुबह अपनी झुग्गी देखने गए। गैस रिसने की रात भागते समय वह वहां ताला लगा गए थे। दरवाजा खोलने पर उन्हें वहां उनके एक बेटे संतोष का शव मिला। रात में मची भगदड़ के दौरान संतोष वहीं छूट गया था। कुछ देर बाद पिता की भी मौत हो गई-संभव है उनकी जान जाने की वजह गैस रही हो या फिर सदमे के कारण उनके दिल ने जवाब दे दिया हो। सुनील के भाई-बहनों में संजय और ममता ही जीवित बचे थे। सुनील पर अब अपने दो छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ पड़ी थी। उसने स्कूल जाना छोड़कर एसओएस गांव में अपने भाई-बहन की देखभाल करने का फैसला किया। हादसे के बाद एसओएस गांव में रखे गए पीड़ित शुरू में सरकारी मदद पर निर्भर थे। उन्हें रोजगार दिलाने की सरकारी कोशिशें बुरी तरह नाकाम हुईं। 70 करोड़ रुपए के खर्च के बावजूद महज 80 से कुछ ज्यादा महिलाओं को ही रोजगार मिल सका।
इस बीच सुनील और जेपीनगर के उस सरीखे अन्य रहवासियों की ओर से भारत और अमेरिका की अदालतों में मुकदमे की कार्रवाई शुरू हुई। भोपाल गैस रिसाव आपदा (दावा प्रक्रिया) कानून 1985 के जरिये भारत सरकार यूनियन कार्बाइड के खिलाफ दायर दीवानी मुकदमे में सभी पीड़ितों की खुदमुख्तार बन गई। उसने न्यूयार्क की संघीय अदालत में तीन अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का दावा ठोका। सरकारी अधिकारियों ने सुनील को बतौर गवाह न्यूयार्क की अदालत में पेश करने का फैसला किया। इसकी वजह हादसे में उसके साथ गुजरा भयावह मंजर था। उसे भारतीय दल के साथ न्यूयार्क ले जाया गया। वहां उसने अपनी कहानी बयान की। मई 1986 में यह मामला इस आधार पर भारत लौटा दिया गया कि यूनियन कार्बाइड ने न्याय क्षेत्र का हवाला देकर अमेरिका में इसकी सुनवाई की मुखालफत की थी।
भोपाल की जिला अदालत ने सुनवाई के दौरान कार्बाइड को 350 करोड़ रुपए की अंतरिम राहत देने का आदेश दिया ताकि मुकदमे के निपटारे में देरी का पीड़ितों पर विपरीत असर न पड़े, लेकिन कार्बाइड ने अंतरिम राहत देने से मना कर दिया और फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने 14 फरवरी 1989 को अंतरिम राहत के मामले में सुनवाई को अचानक नया मोड़ देते हुए भारत सरकार तथा यूनियन कार्बाइड के बीच कोर्ट के बाहर हुए एक समझौते को मंजूरी दे दी, पीड़ितों को समझौते की कोई जानकारी नहीं थी।
समझौते की शर्तो के मुताबिक 4700 लाख अमेरिकी डॉलर देकर यूनियन कार्बाइड सभी दायित्वों से बरी हो जानी थी, उसके तथा उसके अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे वापस ले लिए जाने थे और यदि भविष्य में कोई मामले दायर किए जाते, तो भारत सरकार यूनियन कार्बाइड का बचाव करती। समझौते की रकम भारत सरकार द्वारा शुरू में किए गए दावे की रकम का महज सातवां हिस्सा थी। यह अंतरराष्ट्रीय मानकों से तो बेहद कम थी ही, भारतीय रेलवे द्वारा दुर्घटनाओं के मामले में दिए जाने वाले मुआवजे से भी कम थी। सुप्रीम कोर्ट ने 3 अक्टूबर 1991 को अपने पहले के फैसले में संशोधन कर कार्बाइड द्वारा दी जाने वाली समझौता राशि को मंजूरी देते हुए बाकी की भरपाई भारत सरकार को करने का निर्देश दिया।
इस बीच सुनील के लिए भयावह यादों से जुड़े अपने घर में वापसी और मुश्किल होती गई। 1991 में वह गैस पीड़ितों के लिए संघर्ष करने वाले सत्यनाथ सारंगी के साथ रहने लगा। 1992 में राज्य सरकार ने गैस पीड़ितों के लिए एक कालोनी बनाई। पात्र होने के कारण सुनील भी इस कालोनी में रहने लगा। उसने खुदकुशी भी यहीं की। 1994 में सुनील की बहन ममता 18 बरस की हो गई। एसओएस गांव में इससे ज्यादा उम्र के बच्चे नहीं रखे जा सकते इसलिए सुनील ने ममता और भाई संजय को अपने साथ रखने का फैसला किया। उनके साथ रहने से सुनील का बरसों का अकेलापन कुछ कम तो हुआ मगर इसके लिए शायद बहुत देर हो चुकी थी।
समय बीतने के साथ सुनील दुनियादारी से दूर होता गया। उसने लोगों से बोलना-चालना भी बंद कर दिया। वह बार-बार अवसाद का शिकार हो रहा था और खुदकुशी करने का इरादा जताता था। वह कई-कई दिन घर से नहीं निकलता। निकलता तो भी आवाराओं की तरह मारा-मारा फिरता। खुदकुशी करने के करीब एक दशक पहले सुनील के मनोरोग का इलाज भी किया गया था। उसने शादी से इसलिए इनकार कर दिया था कि उसे अपने छोटे भाई-बहन की जिम्मेदारी पूरी करनी थी। इस बीच उसने बहन की शादी एक इलेक्ट्रीशियन से कर दी और भाई को पहले अंग्रेजी माध्यम स्कूल में और फिर ग्रेजुएशन कराकर अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना दिया। मौत का आलिंगन करते समय वह जो टी-शर्ट पहने था उस पर लिखा था -नो मोर भोपाल। उसकी मौत होने तक हत्यारे गैस कांड के लिए किसी को भी सजा नहीं हुई थी। उसकी मौत के साथ संभवत: न्याय की रही-सही उम्मीद ने भी दम तोड़ दिया है।