सम्पादकीय. ग्लोबल वार्मिग की समस्या से निपटने के लिए इंडोनेशिया के रिसोर्ट द्वीप बाली में सोमवार से शुरू हो रही 180 देशों के प्रतिनिधियों की बैठक इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इसमें 2012 में समाप्त हो रहे क्योटो प्रोटोकॉल की जगह लेने वाली नई संधि की रूपरेखा भी तैयार की जानी है। दुर्भाग्य है कि ग्लोबल वार्मिग की वजह से होने वाले जलवायु परिवर्तन दुनिया को जिस महाविनाश की ओर तेजी से धकेल रहे हैं, उसके प्रति कतिपय विकसित देश अपेक्षित गंभीर नहीं हैं। इस बाबत दुनियाभर की तमाम चिंताएं ओढ़ने का दावा करने वाले अमेरिका का रवैया तो विशेष तौर पर चिंतनीय है क्योंकि उसने क्योटो प्रोटोकॉल तक पर दस्तखत नहीं किए हैं। बाली बैठक के ऐन पहले संयुक्त राष्ट्र के तीन अलग-अलग संगठनों की रिपोर्टो ने ग्लोबल वार्मिग और प्रदूषण के तेजी से बढ़ते स्तर के लिए अमीर देशों पर अंगुली उठाई है। ये रिपोर्टे आगाह करती हैं कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तथा वातावरण में उनका जमाव रोकने के लिए फौरी उपाय नहीं किए गए तो दुनिया में तबाही का सिलसिला थामना प्राय: असंभव हो जाएगा।
यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन आन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) की रिपोर्ट बताती है कि 40 औद्योगिक देशों के इस वादे के बावजूद कि वे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करेंगे, उनके द्वारा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत तथा सोवियत संघ के सदस्य रहे देश प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की रिपोर्ट कहती है कि वातावरण में कार्बनडाईआक्साइड और नाइट्रस आक्साइड की मात्रा रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। इस वजह से पृथ्वी के गर्म होने की रफ्तार इतनी तेज हो जाने की आशंका है जितनी तेज वह पहले कभी नहीं रही।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की मानव विकास रिपोर्ट भी उपरोक्त दोनों रिपोर्टो में व्यक्त की गई चिंता को दोहराते हुए आगाह करती है कि यदि आने वाले 15 वर्षो में भी उत्सर्जन बढ़ने का क्रम बीते 15 वर्षो की तरह बना रहा, तो खतरनाक जलवायु परिवर्तनों को रोक पाना असंभव हो जाएगा। कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि दुनिया को तबाही से बचाने के लिए बाली बैठक आखिरी मौका है। चूंकि दुनिया के संसाधनों पर अमीर और विकसित देशों का गैर-आनुपातिक कब्जा है इसलिए स्वाभाविक है कि दुनिया को बचाने के इस उपक्रम में उनकी भागीदारी भी ज्यादा हो। उम्मीद है कि बाली बैठक महाविनाश को टालने की दिशा में कड़े और सार्थक फैसले लेने में जरा भी नहीं हिचकेगी।