त्वरित टिप्पणी अपनी गतिविधियों और बयानों से कांग्रेस नेतृत्व को कई महीनों से छका रहे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल ने एक बार फिर दांव खेला है। रोहतक की रैली में अपनी नई पार्टी के नाम का ऐलान तो कर दिया, लेकिन उसके गठन की प्रक्रिया तकनीकी रूप से 6 माह के लिए टाल दी।
उनके मंत्र पर चलते हुए उनके पुत्र सांसद कुलदीप बिश्नोई ने भी छह माह बाद संसद की सदस्यता छोड़ने की बात कही है। लोकसभा अध्यक्ष को भेजे गए इस्तीफे संबंधी पत्र में उन्होंने 1 जून से त्यागपत्र प्रभावी होने की बात कही है। पिता-पुत्र ने आधुनिक राजनीति के बेहतरीन खिलाड़ी होने का सबूत देते हुए एक बार फिर गंेद कांग्रेस के पाले में डाल दी। इस तरह से अब यह जोड़ी कांग्रेस में है और नहीं भी है।
रैली में कहने को नई पार्टी, नया झंडा और अगला एजेंडा अपने समर्थकों में देने के बाद भजन खेमा खुद को कांग्रेस से निकाले जाने के लिए नेतृत्व का मजबूर करने में जुटा है। निकले या निकाले गए, इसके अपने फायदे हैं। जिसे भजन लाल से ज्यादा कोई और शायद ही समझ सके।
कांग्रेस ने भी इसे देखते हुए शायद तय कर लिया है कि वह भजन जो चाहते हैं वह नहीं करेंगे। अपनी रैली से भजनलाल ने एक संदेश जरूर दे दिया कि अगले विधानसभा चुनाव और कुछ हो न हो भजनलाल और उनके समर्थक कांग्रेस के सामने ताल जरूर ठोंके ंगे। वे क्या हासिल करेंगे से ज्यादा यह ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि वे कांग्रेस को आने वाले समय में कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसी गणित से कांग्रेस नेतृत्व अब तक इनके खिलाफ कुछ करने से बच रहा है। आज के इस कदम को देखते हुए यदि कहा जाए फिलहाल राज्य की राजनीति को भजनलाल जैसे चाह रहे हैं वैसे चला रहे हैं। एक तरफ कांग्रेस में बगावत के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में सामने हैं और दूसरी तरफ उनका बड़ा बेटा चंद्रमोहन कांग्रेस की भूपेंद्र हुड्डा सरकार में उप मुख्यमंत्री पद पर कायम है। चंद्रमोहन के सरकार में होने की वजह से प्रत्यक्षत: भजनलाल को भले कोई फायदा न हो पर यह मनोवैज्ञानिक दवाब तो नेतृत्व पर है ही कि आखिर कब तक उनका बड़ा बेटा उनसे अलग रहेगा। आखिर तो घुटना पेट के लिए ही झुकेगा।
रैली से पहले संयोजक की भूमिका निभा रहे कुलदीप बिश्नोई ने जो दावे किए थे वे जरूर पूरे नहीं हुए। उन्होंने रैली में कई विधायकों के पहुंचने की दावे किए थे। इसके विपरीत भजनलान के अलावा करनाल के राकेश कंबोज और धर्मपाल मलिक के अलावा कोई और शामिल नहीं हुआ। वैसे कांग्रेस से कई ऐसे नेता जरूर रैली में पहुंचे जो कि फिलहाल किसी बड़े पद पर नहीं हैं। जहां तक भीड़ का सवाल है तो अपने राजनीतिक जीवन में कई बड़ी रैलियां कर चुके भजनलाल के लिए हरियाणा में रैली के लिए भीड़ जुटाना कोई बड़ी बात कभी नहीं रही। रैली की भीड़ के बजाय वे बदलते राजनीतिक समीकरणों की वजह से चर्चा में रहे हैं और आगे रहेंगे भी।
चुनौतियां सिर्फ भजन नहीं- हरियाणा कांग्रेस नेतृत्व के लिए चुनौती सिर्फ भजनलाल ही नहीं हैं। बल्कि पार्टी में बढ़ती गुटबाजी भी है। जिससे देर-सबेर पार्टी की हालत खराब होनी है। हाल में उठा पार्टी के दो सांसदों का विवाद रोजाना नई सुर्खियां दे रहा है। एक तरफ युवा सांसद नवीन जिंदल हैं तो दूसरी तरफ अरविंद शर्मा। दोनों सांसदों द्वारा एक दूसरे पर लगाए जा रहे आरोपों को देखें तो साफ हो जाएगा भले यह एक निजी मसला हो, लेकिन आरोप ऐसे हैं कि कोई भी सांसद गलत साबित हो फजीहत तो कांग्रेस की ही होगी।
जमीन के मामले में नवीन जिंदल और दिल्ली में अपने आवास पर हमले को लेकर सांसद अरविंद शर्मा ने एक दूसरे पर अपराधिक षड्यंत्र के आरोप लगाए हैं। इनमें से किसी पर कार्रवाई हुई तो राज्य के लोगों के बीच तो संदेश यही जाएगा कि उनके प्रतिनिधि कैसे हैं। पार्टी यह सब देखने के बाद भी दोनों से न कुछ पूछने की स्थिति में है और न ही यह विवाद रोकने की स्थिति में है। इस बारे पार्टी के राज्य अध्यक्ष यह जरूर कहते हैं जब शिकायत उनसे की जाएगी तब वे कुछ करेंगे।