जालंधर. वे किसी काम में आम लोगों से कम नहीं और उसी रफ्तार से जिंदगी की हर ऊंचाई को छू रहे हैं, क्योंकि उनमें है विश्वास और हौसला कुछ करने का। आज ‘इंटरनैशनल डे ऑफ डिसएबल्ड’ पर हमने बात की कुछ ऐसे ही लोगों से जिनकी जिंदगी में कुछ कमी तो रही, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी कमी को ताकत बनाया और आज सफलता की बुलंदियों पर हैं। सिटी रिपोर्टर नम्रता दत्त और ज्योति भंडारी की रिपोर्ट।
..और कदमों में दुनिया मैं अकेला ही चला रहा था जानिबे मंजिल मगर लोग मिलते गए और काफिला बनता गया। अर्बन स्टेट के अन्ध विद्यालय में वाइस प्रिंसिपल अजय ठाकुर की आंखों की रोशनी चली गई थी, लेकिन उन्हें अपना लक्ष्य पता था।
जिंदगी के हर रास्ते पर वे अकेले ही चले। किसी का सहारा लेकर चलना उनको पसंद नहीं। जिंदगी को जिंदादली से जीने की चाह रखने वाले अजय ने कहा दुनिया में आया हर इड्डसान डिसेबल है। मैं अपनी जिंदगी से खुश हूं। बचपन में वकील बनने का सोचा था। बाद अपना लक्ष्य बदल दिया और जिस स्कूल में पढ़ाई की आज वहीं वाइस प्रिंसिपल हूं।
मन में है विश्वास.. बार एसोसिएशन के सीनियर वाइस प्रैसीडैंट एडवोकेट अशोक शर्मा बचपन से पोलियो ग्रस्त हैं। उनकी दोनों टांगें 80 फीसदी उनका साथ छोड़ चुकी थीं, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं खोया और नित सफलता के नए आयाम स्थापित करते रहे। उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें 15 अगस्त को डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से डिस्ट्रिक्ट अवार्ड से भी नवाजा गया। वे हैल्पलाइन सोशल आर्गेनाइजेशन के डिस्टिक्ट प्रैसीडैंट और उनका सपना डिसेबल लोगों के जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में उनकी मदद करना है। 35 वर्षीय अशोक शर्मा का कहना है कि जिदंगी में सब संभव है बस दिल में सच्ची लगन होनी चाहिए।
हम किसी से कम नहीं स्टेट बैंक ऑफ पटियाला में कंप्यूटर आपरेटर और एस्ट्रोलॉजी में अच्छा खासा नाम कमाने वाले 40 वर्षीय संजय सात साल की उम्र से पोलियो ग्रस्त हैं। संजय आर्टीफिशियल अंगों के सहारे खुशनुमा शादीशुदा जिंदगी बिता रहे हैं।
उनका एक बेटा भी है। कहीं भी बिना किसी के सहारे के जाने वाले संजय को किसी का सहारा नहीं चाहिए। उन्हें उन लोगों से सख्त नफरत है जो विकलांगों को सहानुभूति देते हैं। उन्होंने कहा कमियां हर इंसान में होती हैं, लेकिन इसे अपनी कमजोरी नहीं बनानी चाहिए। हर हालात का डटकर मुकाबला करना चाहिए। डिसेबल्ड लोग किसी फील्ड में आम लोगों से कम नहीं।
जो डर गया, समझो मर गया.. कुदरत ने भले ही विवेक जोशी को पूरी तरह फिट नहीं बनाया लेकिन अपने दिमाग से उन्होंने फिट लोगों को भी फेल कर दिया। 27 साल के विवेक पीसीएस करके जज बनना चाहते हैं और इसके लिए वे कड़ी मेहतन कर रहे हैं। उनको डिसएबल्ड लोगों पर तरस खाने वालों से सख्त नफरत है।
..तो फिर बढ़ जाएगी जिंदगी की रफ्तार रैडक्रास जैसी संस्थाएं सिटी के इन स्कूलों को फंड तो दे रही हैं, लेकिन उनकी जरूरतों को पूरा करने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए यह काफी नहीं। रैडक्रास सोसाइटी द्वारा चलाया जा रहा डैफ एंड डंब स्कूल के पिं्रसीपल परमजीत सिंह मानते हैं कि इन बच्चों में हर तरह की बात को समझने और कोई भी काम सीखने की क्षमता है। जहां तक टैक्नोलॉजी की बात है तो फंड्स के बिना यह पॉसीबल नहीं हो सकता ।
वहीं प्रयास स्कूल के प्रिंसीपल रविंदर के अनुसार अगर ये बच्चे ओलंपिक और विभिन्न मुकाबले में चैंपियन बन सकते हैं तो यकीनन मौका मिलने पर आईटी क्षेत्र में भी अपना हुनर दिखा सकते हैं। शहर के इन स्कूलों को मल्टीनैशनल कंपनीज के साथ की जरूरत है।
बड़े शहरों में सरकार के साथ-साथ प्राइवेट कंपनीज भी मदद के लिए आगे आती हैं। जेसीडीए के प्रैसीडैंट राजीव खन्ना ने कहा वे समय समय पर एसोसिएशन की तरफ से कंप्यूटर डोनेट करते रहते हैं लेकिन इन स्कूलों में कंप्यूटर एजूकेशन शुरु करवाने के लिए कॉरपोरेट कंपनीज का आगे आना जरूरी है। आईटी से अवेयर होने पर बच्चे खुद को खुल कर एक्सप्रैस कर सकते हैं।
सोशल सर्कल डिवैलप होगा इंटरनैट पर इन बच्चों के लिए खास साइट्स उपलब्ध हैं जिससे अपनी कम्युनिटी बनाकर सोशल सर्क ल डिवैलप कर पाएंगे। सैकेंड लाइफ, डिसएबल्ड पैशन, डिजाबूम जैसी साइट्स इनके लिए हो सकती हैं मददगार। इन साइट्स पर 200 मिलियन से अधिक यूजर हैं। इन साइट्स पर डाक्टर्स, केयरगिवर्स, एंप्लायर्स और पेरेंट्स मैंबर्स हैं और ऐसी साइट्स पर उन्हें हर तरह की मदद, हैल्थ और लाइफस्टाइल से रिलेटेड जानकारी मिल सकती है।
जो कंप्यूटर से जुड़े एमए म्यूजिक वोकल के साथ कंप्यूटर में एक्सपर्ट सन्नी अब पूरी तरह से प्रोफैशनल हैं। वो कंप्यूटर पर डेजी बुक रिकार्ड भी कर लेते हैं और एडिट भी। साथ ही अपनी ई-मेल पढ़ना और दोस्तों के साथ कनैक्टेड रहना आसान हो गया है। वो कहते हैं कंप्यूटर के जरिए समाज में आम लोगों के साथ जुड़ना आसान हो जाता है। मनप्रीत कौर पेंटिंग में फस्र्ट, डैफ एसोसिएशन द्वारा करवाए गए किक्रेट मैच में स्कूल की टीम जीती।
मैट्रिक से एलएलबी तक फस्र्ट पोजीशन हासिल करने वाले विवेक उन लोगों को जागरुक करना चाहते हैं जो विकलांगता की वजह से हौसला हारकर जीने की उम्मीद छोड़ देते हैं।
उन्होंने बताया कि शरीर ने साथ नहीं दिया लेकिन शार्प ब्रेन का गिफ्ट मुझे परमात्मा से मिला है। मै जज बनकर ही रहूंगा। साथ ही भविष्य में डिसएबल्ड लोगों के लिए काम करूंगा।