मुंबई. तकरीबन पांच सदी पुरानी बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को ध्वस्त कर दिया गया था। मंदिर को तोड़कर बनाई गई मस्जिद की जगह मंदिर बनाने की बात पर अड़े करीब डेढ़ लाख हिंदुओं की भीड़ ने 15 साल पहले इस घटना को अंजाम दिया था जबकि उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। आइए डालते हैं बाबरी मस्जिद से जुड़े तमाम प्रकारणों पर एक नजर..
इतिहास :
16वीं शताब्दी मुगल बादशाह बाबर ने इस मस्जिद का निर्माण कराया था। अयोध्या में यह मस्जिद रामकोट हिल इलाके में है जिसे राम जन्मभूमि के नाम से जाना जाता है। 1940 से पहले तक इस मस्जिद को मस्जिद-ए- जन्मस्थान के नाम से भी जाना जाता था।
कहा जाता है कि बाबर के सिपेहसालार मीर बकी ने इस स्थान पर बने राम मंदिर तोड़कर मस्ज्दि का निर्माण कराया और शहंशाह बाबर के नाम पर इसका नामकरण किया। यह भी एक रोचक तथ्य है कि इस मस्जिद की एक दीवार राम मंदिर से लगी हुई थी। बाबरी मस्जिद उत्तरप्रदेश की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक थी।
हिंदू पार्टियों ने जो इतिहास प्रस्तुत किया है उसके हिसाब से इस स्थान पर भगवान राम का जन्म हुआ था और यहां उनका एक भव्य व विशाल मंदिर था जिसे मीर बकी ने बाबर की मंजूरी से तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया। इन तथ्यों की पुष्टि ऐसे भी होती है कि यहां मंदिर का होना, उसे तोड़कर मस्जिद बनाए जाने का जिक्र एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में भी मिलता है। साथ ही, बाबर के समय में लिखे गए ग्रंथ तारीख-ए-बाबरी में इसका जिक्र है कि बाबर की सेना ने कई हिंदू मंदिरों को तोड़ा था।
ऐसा भी माना जाता है कि 18वीं सदी की शुरुआत में अवध के नवाब शुजाउद्दौला और आसफुद्दौला के समय में अयोध्या ताीर्थ और पर्यटन का केद्र था लेकिन 1853 में समस्या पैदा हुई जब हिंदुओं के एक संप्रदाय निर्मोही ने दावा किया कि मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर था जिसे तोड़ा गया है। इसके बाद समय-समय पर इसे लेकर विवाद होता रहा और इसी सिलसिले में 1885 में एक स्थानीय महंत ने कोर्ट में याचिका भी दायर की थी लेकिन उसे खारिज कर दिया गया।
दूसरी तरफ, मुस्लिम पार्टियों के मत से यह पुराने समय से ऐसा स्थान था जहां हिंदू व मुस्लिम दोनों ही पूजा-अर्चना करते थे। 19वीं सदी के अंत में इसके चबूतरे पर कुछ हिंदुओं ने यहां मंदिर निर्माण की इच्छा जताई और प्रशासनिक स्तर पर प्रयास भी किए। 1934 के दंगों के दौरान मस्जिद की दीवारें व गुंबद को नुकसान हुआ जिसका पुनर्निर्माण ब्रिटिश सरकार ने कराया। इतने लंबे संघर्ष के बाद 1949 में रातोंरात यहां राम और सीता की मूर्तियां स्थापित कर दी गईं।
इस मामले पर जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के बाद उप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोबिंद बल्लभ पंत ने इन मूर्तियों को हटाने का आदेश दिया था लेकिन हिंदुओं की भावनाओं और उनकी उग्रता के डर से हटाया नहीं जा सका।
15 साल पहले :
भारत के पुरातत्व विभाग की ओर से एक रिपोर्ट जारी की गई जिसमें पुष्टि की गई कि मस्जिद के नीचे कुछ ढांचे होने के प्रमाण मिले हैं। आर्कियोलॉजी सोसायटी की रिपोर्ट का सारांश यह था कि मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर होने के पर्याप्त सबूत हैं। पुरातत्व और वास्तुकला के शोध के आधार पर कहा गया था कि जिस तरह के ढांचे के सबूत मिले हैं, वह उत्तर भारतीय मंदिरों की तरह के हैं।
हालांकि इस रिपोर्ट का मुस्लिम पार्टियों और समुदाय ने विरोध किया लेकिन विश्व हिंदू परिषद ने एएसआई की रिपोर्ट के आधार पर मंदिर के पक्ष में आवाज बुलंद की और सुर में सुर मिलाया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने।
6 दिसंबर 1992 को मस्जिद का ढांचा ढहा दिया गया और उसके बाद पूरे देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे जिसमें सैकड़ों जानें गईं।
फिर क्या हुआ :
16 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के हालात कैसे बने, इसकी विस्तृत जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया। भारत के इतिहास में यह आयोग सबसे लंबे समय तक चलने वाला आयोग है जिसकी रिपोर्ट को लेकर कोई समय सीमा नहीं है। 15 सालों में इस मामले की कोई पुख्ता जांच नहीं हो पाई है और न ही अब तक इस मामले में कोई बड़ी सजा हुई है।
दूसरी तरफ, राम मंदिर का मुद्दा राजनीतिक रंग में रंग गया और भारतीय जनता पार्टी ने तो राम मंदिर और हिंदुत्व के नाम पर कई वादे किए और सत्ता में आने में भी कामयाब रही लेकिन भाजपा के केंद्र में पूरे कार्यकाल के बाद भी न तो अब तक राम मंदिर बन सका और न ही यह गुत्थी सुलझ सकी कि आखिर 1992 के जानलेवा घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार कौन था? सवाल यह भी है कि हमारे देश की न्यायपालिका इतने गंभीर मामलों को प्राथमिकता और शीघ्रता के साथ सुलझाने में असफल क्यों है?