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अपनी जिम्मेदारी से पल्ला न झाड़े सरकार

अभिमत. माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक देखरेख व कल्याण विधेयक 2007 पर लोकसभा के बाद राज्यसभा ने भी गुरुवार को मंजूरी की मोहर लगा दी है। कानून बनते ही वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्युनल में शिकायत कर अपने बिगड़े बच्चों को इस बात के लिए मजबूर कर सकेंगे कि वे गुजारे के लिए उन्हें हर महीने खर्च अदा करें। र्दुव्‍यवहार होने पर वे उस संपत्ति को वापस भी ले सकेंगे जो उन्होंने अपने युवा रिश्तेदारों के नाम कर दी है।

इन प्रावधानों के पीछे छिपी भावना की प्रशंसा की जानी चाहिए, मगर यह बहस का मुद्दा है कि क्या एक सामाजिक समस्या का हल सिर्फ कानून बनाकर किया जा सकता है। और ऐसा भी नहीं है कि सभी बच्चे अपने बुजुर्गो की अनदेखी करना चाहते हैं, हालांकि वर्तमान दौर के तनावों के चलते यह अक्सर मुश्किल हो जाता है। और यहीं कानून की सीमाएं पता चलती हैं। नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 41 के तहत सरकार के लिए ऐसे प्रभावकारी प्रावधान बनाना लाजिमी है जिससे कि वृद्धावस्था में नागरिक सार्वजनिक सहायता का अधिकार सुनिश्चित कर सकें। यहां सार्वजनिक सहायता से आशय वृद्धावस्था पेंशन, वृद्धाश्रम, मुफ्त अथवा रियायती स्वास्थ्य परीक्षण, विशेष स्वास्थ्य बीमा योजनाएं आदि हैं। नया विधेयक इस बारे में मौन है कि क्या सरकार इन्हें उपलब्ध कराएगी। इन सुविधाओं के लिए फिलहाल सरकार की तरफ से किया जा रहा खर्च नगण्य है।

सन 2001 में देश में वृद्ध लोगों की तादाद 7.1 करोड़ थी जो 2026 में बढ़कर 17.3 करोड़ हो जाएगी। ऐसे परिदृश्य में पर्याप्त कल्याणकारी योजनाओं के अभाव में कानूनी प्रावधान बेअसर ही रहने वाले हैं। देश के कर्णधारों को सिंगापुर में प्रचलित माता-पिता की देखरेख कानून से सबक लेने की जरूरत है। वहां कानून के अलावा सेहत, पेंशन आदि सरकारी योजनाएं भी बुजुर्गो के लिए लागू की गई हैं। हमारे यहां इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध होने पर बच्चे भी इनका लाभ लेते हुए अपने बूढ़े मां-बाप की सही देखभाल कर सकेंगे।





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