आलेख. प्राय: चिकित्सा जगत को अपनी कठिनाइयों तथा समस्याओं के निराकरण के अभाव में आंदोलन के लिए बाध्य कर दिया जाता है। यह चिंता का विषय है क्योंकि इससे सामान्यजन का स्वास्थ्य जुड़ा हुआ है। चिकित्सा शिक्षा पाठ्यक्रम की अवधि बढ़ाने को लेकर उठे विवाद से ऐसी ही स्थिति बनी है। हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने एमबीबीएस पाठ्यक्रम की अवधि नहीं बढ़ाने की बात कही है, फिर भी वे मेडिकल स्नातकों की गांवों में पदस्थापना पर अड़े हुए प्रतीत होते हैं। अत: यह सही समय है, हम समस्या पर गहन चिंतन करें और प्रयास करें कि भविष्य में चिकित्सा जगत को आंदोलन की राह न अपनाना पड़े।
भारत में चिकित्सा शिक्षा 1822 में कोलकाता में मेडिकल स्कूल स्थापना के साथ शुरू हुई थी जो 1935 में चिकित्सा महाविद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया। चिकित्सा शिक्षा के स्तर, पाठ्यक्रम तथा अन्य मापदडों के निर्धारण के लिए 1933 में एक कानून के माध्यम से मेडिकल काउंसिल का गठन किया गया और 1934 में खानबहादुर सर फजल हुसैन ने अपेक्षा की थी कि काउंसिल के कार्य से स्वदेश में कार्यकुशलता बढ़े और विदेश में सम्मान। इसके विपरीत चिकित्सा शिक्षा के बेतरतीब विस्तार और पाठ्यक्रमों में सुविधानुसार अनावश्यक परिवर्तन से इसके स्तर में गिरावट आई है और यह क्षेत्र प्रयोगशाला बन गया है। एक अन्य बिंदु सरकार के पाठ्यक्रम अवधि बढ़ाने के निर्णय से और जुड़ गया है जिसने देश में विषम वातावरण बना दिया है। 1935 में चिकित्सा शिक्षा के लिए पांच वर्ष का पाठ्यक्रम था। 1952 में इसे प्रशिक्षण अवधि सहित साढ़े पांच वर्ष का बनाया गया। इसमें दो मत नहीं है कि आदिवासी तथा ग्रामीण अंचल में चिकित्सा सुविधाएं अपर्याप्त या नगण्य हैं। इस पर चिकित्सा जगत में भी चिंता है। इस असंतुलित व्यवस्था के कारणों की पड़ताल तथा उत्तरदायित्व, निश्चित करने का यह सही अवसर है।
भारत में पूर्व स्वास्थ्यमंत्री स्व. राजनारायण ने ‘बेअर फुट डॉक्टर्स’ तथा ‘चलित चिकित्सा इकाई’ की स्थापना का असफल प्रयास किया था। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने साढ़े तीन वर्षीय पाठ्यक्रम की परिकल्पना की थी। चीन में चिकित्सकों की कमी दूर करने के लिए चिकित्सा शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश संख्या में पर्याप्त वृद्धि की थी। उधर, श्रीलंका में ग्रामीण क्षेत्रों में समुचित अधोसंरचना उपलब्ध कराने से चिकित्सकों को ग्रामीण क्षेत्र में कार्य करने में कोई आपत्ति नहीं थी। खेद है कि हर सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की अनुपलब्धता का शोर तो खूब मचाया किंतु साठ वर्षो में किया कुछ नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार ग्रामीण क्षेत्र में चिकित्सीय सेवा उपलब्ध कराने में असफलता को ढंकने का प्रयास इस प्रकार के निर्णय के जरिये कर रही है। किसी समस्या के निराकरण के लिए उभय पक्षों से विचार-विमर्श करना होता है, किंतु पाठ्यक्रम जैसे विषय पर विचार करने से पहले चिकित्सा शिक्षा छात्र और शिक्षक समुदाय से विचार विमर्श करना आवश्यक नहीं समझा गया।
कई पाश्चात्य देशों में ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञ समिति गठित की जाती है और उसकी रपट आने के बाद ही निर्णय लिया जाता है। चिकित्सक और छात्रों की मानवीय आवश्यकताओं की ओर ध्यान देना जरूरी है। यह वर्ग भी इसी समाज का अंग है। फिर यह भी स्थापित सत्य है कि चिकित्सा शिक्षा छात्रों की शिक्षा प्रशिक्षण के पश्चात ही समाप्त होती है और उन्हें उपाधि प्राप्त करने की पात्रता होती है। बगैर उपाधि के उनसे चिकित्सकीय कार्य की अपेक्षा करना अनुचित भी है और गैर कानूनी भी। चिकित्सक स्नातकोत्तर परीक्षा पास करते-करते लगभग 30 वर्ष की आयु पर पहुंच जाते हैं और उनकी आय न्यूनतम होती है जबकि अन्य विधाओं में छात्र 25 वर्ष की आयु के पूर्व शिक्षा समाप्त कर अच्छी आय प्राप्त करने लगते हैं।
इस विरोधाभास के निराकरण की ओर हमारा ध्यान क्यों नहीं जाता? उपरोक्त माहौल में भी चिकित्सा समुदाय ग्रामीण क्षेत्र चिकित्सा व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ उपाय सुझाना चाहता है जो तात्कालिक रूप से क्रियान्वित किए जा सकते हैं। प्राथमिकता के आधार पर जिला चिकित्सालय को केंद्र बिंदु बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन चलित इकाई के जरिये चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना संभव है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था समय-सीमा में पूरी की जाए तो चिकित्सकों को ग्रामीण क्षेत्रों में जाने में कोई आपत्ति नहीं होगी। सरकार एक विशेषज्ञ समिति गठित करे जिसमें छात्र प्रतिनिधि तथा वरिष्ठ चिकित्सक हों जो तय समय सीमा अपना प्रतिवेदन दे जिस पर सरकार भी सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाए। बेहतर यही होगा कि सरकार पाठ्यक्रम अवधि में वृद्धि के निर्णय को समाप्त कर वातावरण को सामान्य बनाए।
-लेखक जीआर मेडिकल कॉलेज ग्वालियर के डीन रह चुके हैं।