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वाम मोर्चा के मुकाबले रोटी का मोर्चा

दृष्टिकोण. पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की राजनीति इस समय पिछले 30 साल के सबसे संगीन संकट से गुजर रही है। उस पर इतनी आफतें एक साथ शायद ही कभी आई हों। एक तरफ सिंगुर और नंदीग्र्राम में सेज बनाने की कोशिशों के कारण उसके खिलाफ न केवल जन-संघर्षो की शुरुआत हो चुकी है, बल्कि नागरिक समाज के बौद्धिक-सांस्कृतिक दायरों की ताकतें भी पहली बार उसके खिलाफ मुखर दिखाई दे रही हैं। दूसरी तरफ इसी चक्कर में माओवादियों को बंगाल की जमीन पर कदम जमाने का मौका मिल गया है और अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता ने भी सिर उठा लिया है लेकिन वाम मोर्चा सरकार के लिए सबसे ज्यादा चिंताजनक तो बंगाल में चल रहा वह जुझारू खाद्य आंदोलन है जिसने गरीब जनता के लिए डिजाइन की गई सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का अनूठा नमूना पेश किया है।

सन २क्क्१ में दायर की गई जनहित याचिका पर हाल ही में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस प्रणाली में लगभग तीस हजार करोड़ रुपए सालाना का भ्रष्टाचार हो रहा है। कोर्ट के अनुसार सरकारें गरीब जनता पर कहर बरपाने वाली यह लूट खत्म करने के लिए कुछ नहीं कर रही हैं। हालांकि यह वितरण प्रणाली सभी प्रदेशों में एक ही समस्या से पीड़ित है, लेकिन बंगाल इस भ्रष्टाचार में सबसे आगे है। टाटा इकोनॉमिक कंसल्टेंसी सर्विस की एक रपट के मुताबिक गरीबों में बांटे जाने वाले सस्ती दरों के राशन का 40 फीसदी चावल, 34 फीसदी गेहूं और 24 फीसदी चीनी खुले बाजार में बेचने का कारनामा करके पश्चिम बंगाल ने इस भ्रष्टाचार में अन्य सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। जहां तक पीडीएस के कुल अनाज के बाजार में बिकने का सवाल है, उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय द्वारा दिए गए तथ्यों के अनुसार बंगाल का नंबर सिर्फ उत्तरप्रदेश से ही नीचे है। 2006 की सीएजी रपट बताती है कि इस साल बंगाल की पीडीएस से करीब 2,000 करोड़ रुपए लूटे गए।

अन्य प्रदेशों में लूट का माल मुख्यत: तिकड़मबाज अराजनीतिक राशन डीलरों और स्थानीय नौकरशाही के बीच बंटता है। लेकिन बंगाल में इसका एक तीसरा कोण भी है। यह है पंचायतीराज के सरबराहों और पार्टी कैडरों का। राशन की दुकान को क्लीन चिट देने की जिम्मेदारी पंचायत के नुमाइंदे, किसी एक स्थानीय गणमान्य व्यक्ति और खाद्य विभाग के अफसर की होती है। पंचायत का नुमाइंदा भी माकपा का होता है और गणमान्य व्यक्ति भी। यही सत्य है कि इस साल जब सितंबर-अक्टूबर में खाद्य आंदोलन वहां बहुत बड़े पैमाने पर फैला, तो देखा गया कि गुस्से से भरी जनता के निशाने पर डीलरों और सरकारी कारकूनों के साथ-साथ पार्टी के स्थानीय नेता भी हैं। ध्यान रहे कि तीन दशक की वामपंथी हुकूमत ने बंगाल में ऐसा कुछ भी नहीं छोड़ा है जो माकपा की इजाजत के बिना हो जाता हो। वहां कुछ अच्छे काम हुए हैं तो वे भी इसी पार्टी की देन हैं और अगर आज पीडीएस के भ्रष्टाचार के कारण बंगाल उफन रहा है तो इसकी तोहमत भी माकपा के हिस्से जाएगी।

साठ के दशक में बंगाल को गरीब समर्थक हुकूमत मुहैया कराने के वादे के साथ माकपा ने संयुक्त मोर्चे में साझेदारी करके अपनी सत्ता के सफर की शुरुआत की थी। १९७७ के बाद से यह पार्टी आज तक चुनाव नहीं हारी है और पूरे दर्प के साथ मानती है कि उसकी सरकार देश की किसी भी अन्य राज्य सरकार से बेहतर और जनोन्मुख है लेकिन उसके खिलाफ चल रहा खाद्य आंदोलन एक-दूसरे ही पहलू की तरफ इशारा कर रहा है। यह संघर्ष अचानक ही शुरू नहीं हुआ है। आंदोलन के आसार 2005 से ही नजर आने लगे थे जब पश्चिमी मिदनापुर से भुखमरी के कारण मौतों की खबरें आई थीं। मरने वाले लोधा और सबर जनजातियों के थे।

तीन साल से इस तरह के समाचार बीच-बीच में आते रहे हैं और ज्यादातर मामलों में भुखमरी का प्रकोप दूर-दराज के इलाकों में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले अल्पसंख्यकों, खेतिहर मजदूरों और अनुसूचित जाति-जनजाति की जनता को झेलना पड़ा है। इन क्षेत्रों में न तो कृषि विकास का कोई असर पड़ा है, और न ही औद्योगिक विकास की यहां तक कोई पहुंच हुई है। जब पूरे राज्य में पीडीएस ध्वस्त हो गई, तो बांकुड़ा के इलाके में जन-असंतोष फूट पड़ा और जल्दी ही बीरभूम, पुरुलिया और दोनों मिदनापुरों में जनता भ्रष्ट राशन डीलरों और उनके पीछे खड़े माकपा नेताओं पर हमले करने लगी। राशन डीलरों में माकपा सदस्यों की खासी संख्या है। इसलिए पार्टी की इकाई हमेशा उनके पक्ष में खड़ी रहती है।

जाहिर है कि पुलिस द्वारा भी उन्हीं का साथ दिया जाता है। जनता जब राशन डीलरों को खदेड़ती है तो वे भागकर माकपा नेताओं के घरों या पार्टी दफ्तरों में पनाह लेते हैं। नतीजतन पार्टी और जनता के बीच संग्राम शुरू हो जाता है। एक-दो जगह तो कई महीनों से राशन न बंटने के कारण नाराज लोगों ने डीलरों की पिटाई की तो वे वहां हो रही एक स्थानीय पार्टी कांफ्रेंस में छिप गए। फिर क्या था? पार्टी कैडर लाठी-डंडों और तलवारों से लैस होकर आंदोलनकारियों पर टूट पड़े। जंग हुई और अंतत: पुलिस ने पार्टी के पक्ष में हस्तक्षेप किया। आंदोलनकारी गरीबों पर राशन डीलरों और पुलिस द्वारा गोलियां चलाने की घटनाएं भी हो चुकी हैं। आंदोलन का नेतृत्व वामपंथी ताकतों के हाथों में ही है। इनमें भाकपा (माले) ने उल्लेखनीय पहल की है और सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ने भी इन संघर्षाें का साथ दिया है। आंदोलन बर्धमान, नदिया और मुर्शिदाबाद में भी फैल चुका है।

कार्ल मार्क्‍स ने एक बार कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहली बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार प्रहसन के तौर पर। इस मामले में इतिहास खुद को त्रासदी के रूप में ही दोहरा रहा है। इसी तरह के एक खाद्य आंदोलन की लहरों पर सवार होकर वामपंथी साठ के दशक में पहली बार सत्ता में भागीदार बने थे। पार्टी के पुराने समर्थकों को याद होगा कि पीसी सेन की कांग्रेस सरकार ने 1966 की फरवरी में खाद्य आंदोलन का खूनी दमन किया था। इसकी वजह से फैले असंतोष के कारण ही अजय मुखर्जी की गठबंधन सरकार बनी थी। जाहिर है कि त्रासदी के बाद अब प्रहसन शुरू होगा। जैसे-जैसे चुनाव करीब आएगा, अच्छी सरकार चलाने के माकपाई दावों को इसी जुझारू खाद्य आंदोलन के आईने में अपनी तस्वीर देखनी होगी। सरकार के राजनीतिक कारकून कम से कम इतना तो जानते ही होंगे कि यह रोटी का मोर्चा है जिसके मुकाबले कोई और मोर्चा नहीं टिकता।

-लेखक सीएसडीएस के भारतीय भाषा कार्यक्रम में संपादक हैं।





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