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राम के अस्तित्व पर सवाल

सम्पादकीय. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि द्वारा भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाए जाने के बाद अब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी ऐसा ही बयान देकर करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। उन्होंने कोलकाता के एक कार्यक्रम में रामसेतु को प्राकृतिक ढांचा बताते हुए राम के चरित्र को कवि की कल्पना करार दिया। उनका यह कथन नंदीग्राम के विवादास्पद मुद्दे से लोगों का ध्यान बंटाने की कोशिशों का हिस्सा हो सकता है मगर इस पर होने वाली प्रतिक्रिया उनकी आलोचना और निंदा का दायरा और भी बढ़ा सकती है। अवतारवाद की अवधारणा में यकीन नहीं रखने वाली बुद्धदेव की मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी या करुणानिधि की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम के लिए राम भले ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हों और उनके सिद्धांतकार राम के अस्तित्व को नकारने के कितने भी उपक्रम क्यों न करें मगर हकीकत है कि वे देश के जनमानस में गहराई तक रचे-बसे हैं और उसमें भगवान राम की जो मूर्त-अमूर्त छवि बनी हुई है उसे कुछ बड़बोले बयानों से खंडित नहीं किया जा सकता है। हकीकत है कि एकेश्वरवादी मुसलमानों का एक तबका भी राम को इमाम-ए-हिंद का दर्जा देता है।

दुर्भाग्यजनक है कि माकपा और द्रमुक सरीखी पार्टियां राजनीतिक कारणों से राम को हिंदुत्ववादी पार्टियों और संगठनों से जोड़कर देखने और राम की व्यापकता को संकीर्ण दायरे में समेटने की कोशिश करती हैं। इसकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही होती है और भाजपा तथा विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के पुरोधा राम के नाम पर हिंदू समाज को उद्वेलित करने की कोशिशों के जरिये अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति में लग जाते हैं। इन स्थितियों में हिंदू समाज का वह बड़ा वर्ग, जिसका हिंदुत्ववादी पार्टियों-संगठनों से किसी तरह का नाता नहीं होता मगर राम में गहरी आस्था होती है, बुरी तरह आहत होने के बावजूद किंकर्तव्यविमूढ़ तमाशबीन बनकर रह जाता है।

करुणानिधि या बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा राम के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाए जाने से हिंदू समाज के उपरोक्त वर्ग को हिंदुत्ववाद का परचम थामकर राजनीति करने वालों से कम पीड़ा नहीं होती। यह वर्ग भी करुणानिधि और बुद्धदेव के बयानों का बढ़-चढ़कर विरोध कर सकता है पर खुद पर हिंदुत्ववादी होने का लेबल चस्पा नहीं होने देने की गरज से वह खामोशी बरतने का विकल्प अपनाता है। इस खामोशी को नापने का कोई वस्तुनिष्ठ पैमाना भले ही नहीं है फिर भी आस्था के प्रतीकों पर हमला करने वालों को इसे ‘मौन: सम्मति लक्षणम’ मानने की चूक नहीं करनी चाहिए।





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