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Chhattisgarh
Raipur Raipur रायपुर. नई राजधानी के गांवों की दीवारें ज्यादा मुआवजे के नारों से रंगने लगी हैं। पहली किश्त में खासा मुआवजा हासिल करने वाले भी कहने लगे हैं कि उन्हें सरकार ने लूट लिया। कुहेरा, राखी और आसपास इस मुद्दे पर अभियान सा छिड़ा हुआ है। चौराहे से चौपाल तक सिर्फ एक ही चर्चा है, 25 लाख रुपए एकड़ चाहिए।
दैनिक भास्कर टीम ने नई राजधानी के गांवों में पांच गुना मुआवजे की नई मुहिम को महसूस किया। ग्रामीणों ने माना कि नई राजधानी के दायरे में आने से पहले उन्हीं गांव में जमीन डेढ़-दो लाख रुपए एकड़ से ज्यादा में खरीदनेवाला कोई नहीं था। मुआवजे के रूप में इतनी मांग क्यों? इसके जवाब में कई तर्क हैं।
कुछ ग्रामीणों ने कहा कि यहां की पूरी जमीन चली जाने के बाद आसपास के गांवों में जाना पड़ेगा। वहां जाकर जमीन का रेट पता लगाते हैं तो कोई भी 10-12 लाख रुपए एकड़ से कम नहीं बताता। कम मुआवजा मिला तो दूसरे गांवों में कैसे बसेंगे और बाल-बच्चे कैसे पालेंगे?
कुहेरा की सरपंच राजिमबाई जांगड़े का कहना है कि अफसरों ने पहले कहा कि जिनकी जमीनें ली जाएंगी, उन्हें नई राजधानी में दुकानें मिलेंगी। अफसर इसे भूल गए। ऐसे में गांववालों के पास ज्यादा मुआवजा वसूलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।
इस गांव की चौपाल में जुटे किसुन यादव, मनोहरलाल टंडन, सरजू विश्वकर्मा, गंगाराम बंजारे, श्रवण साहू और महादेव धीवर आदि कहते हैं कि हम अपनी उपजाऊ जमीन कैसे दें? वह भी तब, जब आसपास के गांवों में जमीन का रेट कई गुना बढ़ चुका है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अभी धान कटाई में व्यस्त हैं। इसके बाद यह मुहिम तेज की जाएगी।
बदल रही तस्वीर :
गांवों की तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि वहां अभी से नई राजधानी का अहसास होने लगा है। गांवों की चमचमाती सड़कों पर नई गाड़ियांऔर ट्रैक्टर फर्राटे से दौड़ रहे हैं। सपरिवार शहरों की सैर भी की जा रही है। युवा पीढ़ी बाइक दौड़ा रही है। जमीन के मुआवजे से मिले पैसे ने लोगों की जरूरतें भी बढ़ा दी हैं।
उनका कहना था कि बेटे की जिद थी मोटरसाइकिल ले दो। पूरी करनी पड़ी। युवाओं का पहनावा बदल गया। किश्तों में दर्जनों ट्रैक्टर लिए गए हैं। इसी में धान ढोया जा रहा है। खेत में काम केवल पुरानी पीढ़ी ही करती नजर आई। जवानों को खेती में रुचि नहीं है। कुछ पढ़-लिख गए उन्हें तो बिल्कुल नहीं। बुजुर्ग कहते हैं कि कुहेरा सहित कुछ गावों की आधी जमीन जा रही है। जिन गांवों की पूरी जमीनें जा रही हैं वहां के लोग प्रवास के बाद क्या करेंगे?
हर काम में नजराना :
गांव वालों में इस बात पर भी नाराजगी है कि नजराना दिए बिना उन्हें मुआवजा नहीं मिलता। पैसा नहीं मिला, तो काम अटक जाता है। बिना दलाली के जमीन की खरीदी-बिक्री नहीं हो रही। एक ग्रामीण ने आरोप लगाया कि मुआवजे के 5.50 लाख रुपए में से 50 हजार रुपए नजराना देना पड़ गया।
सरकार किसानों को उनकी जमीन की अच्छी कीमत दे रही है। भूमि का रेट बढ़ाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत बढ़ेगी। ऐसे में गरीबों के लिए मकान भी महंगे हो जाएंगे। शासन की मंशा गांवों में कारोबार करने की नहीं है। - एसएस बजाज, सीईओ, नारडा