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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर. तानसेन सम्मान 2007 से अलंकृत गोस्वामी गोकुलोत्सव महाराज कहते हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत सदा सनातन है और कभी पुरातन नहीं हो सकता है। हमारे संगीत में सूर्य की ऊर्जा है और जल की शीतलता है। फ्यूजन की उत्पत्ति की मूल वजह भारतीय संस्कृति के प्रति हमारी अनभिज्ञता है। हमें यह जानना होगा कि हमारी पहचान हमारी संस्कृति से है। वह शुक्रवार को गिर्राज धर्मशाला में पत्रकारों से चर्चा कर रहे थे।
वह कहते हैं कि शास्त्रीय संगीत का मूल स्वरूप विद्यमान रहना चाहिए। जब लोगों को हमारे संगीत के शास्त्रीय पक्ष की जानकारी हो जाएगी तो हम फ्यूजन छोड़ देंगे और कन्फ्यूजन भी। हम लौट आएंगे अपने प्राचीन संगीत की ओर। फ्यूजन की स्थिति पर वह एक गीत गुनगुनाते हैं-‘जब तुम्हारा कोई हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ तुम्हें छोड़ दे, मेरे पास आना प्रिये’।
1972-73 में आए थे समारोह में :
सन् 1972-73 में तानसेन समारोह में प्रस्तुति देने का अवसर मिला था। उस समय लगभग पंद्रह हजार श्रोताओं की मौजूदगी थी। प्रस्तुति के लिए सर्वप्रथम पौन घंटे का समय मिला था। बाद में गायन शुरू होने के पश्चात पंडित कृष्णराव पंडित और उस्ताद अली अकबर खां ने डेढ़ घंटे का समय कर दिया था। उस समय श्रोताओं के रूप में स्वयं पंडित कृष्णराव पंडित, उस्ताद अली अकबर खां, पंडित रविशंकर, गुलाम मुस्तफा जैसे ख्यातिनाम व्यक्ति उपस्थित थे।
उस्ताद अमीर खां की शैली से प्रभावित :
गायन की प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता गिरधरलाल महाराज से प्राप्त की। उन्होंने गायन का हर अंग खयाल, शास्त्रीय गायन, ध्रुपद, सामगान, प्रबंध, तरान और कई विधाओं का ज्ञान दिया। बाद में उस्ताद अमीर खां की शैली से प्रभावित हुआ। वह इंदौर स्थित हमारे आवास में आते थे और हमारी कई पारंपरिक बंदिशें भी गाते थे। शुरुआती समय में उस्ताद अकबर अली खां, उस्ताद अमान अली खां आदि की गायकी को आत्मसात किया, पर सुकून उस्ताद अमीर खां की गायकी में मिला।
संगीत के स्वर किसी घराने का नहीं :
घराने अभी डेढ़ सौ साल पहले आए हैं। संगीत के स्वर किसी घराने के नहीं हैं। राग विहाग, राग मालकौंश किसी घराने के नहीं हैं। हमारे यहां रुद्र, ब्रrा, नारद, भरत और शिव मत हैं, जो हमारी परंपराएं हैं। हमारे यहां वाणी है शुद्धा, भिन्ना और गौरी, जो अब अपभ्रंश हो गया है। घराने घरोंदे की तरह हैं और हमारा शास्त्रीय संगीत वास्तव में वटवृक्ष है।
संगीत सिर्फ प्रेम का पैगाम देता है :
‘परिंदों में कभी फिरकापरस्ती नहीं देखी, कभी मंदिर पर जा बैठे, कभी मस्जिम पर जा बैठे’ यह शेर सुनाते हुए महाराज जी कहते हैं कि संगीत सिर्फ प्रेम का पैगाम नहीं देता है। संगीत हिन्दू, मुसलमान या अन्य किसी धर्म की बंदिशों में कैद नहीं होता है, वह सबके लिए समान है। ईश्वर का वरदान है। स्वर मनुष्य को सर्वोत्तम बनाता है। हमारे शास्त्रीय संगीत में भिन्नता है, पर विसमता नहीं। संगीत हमें तनाव रहित जिंदगी देता है। स्वरों में ईश्वर की सुगंध होती है।
संगीत है तो दूसरे साथ की आवश्यकता नहीं :
जिसके पास संगीत है, उसे दूसरे किसी साथ की आवश्यकता नहीं है। स्वर के बिंदु में ईश्वर का स्नेह समाहित है। संगीत सिंधु की तरह है, जिसके एक बिंदु से संपूर्ण सागर का आभास हो जाता है। यह ईश्वर की मिठास है। संगीत साधकों को सात्विक भाव से रहना चाहिए और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित करनी चाहिए। इसका संबंध आत्मा से है। गुरु-शिष्य परंपरा पर उनका कहना था कि यदि छात्र अपने आपको गुरु को सौंप दे, उनका आशीर्वाद ले तो उसकी उन्नति होगी।