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सुप्रीम कोर्ट की सामयिक व सही हिदायत

अभिमत. सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को सरकार चलाने की कोशिश नहीं करने की हिदायत देकर सामयिक और सही पहल की है। उम्मीद है कि उसके ताजा निर्देश से निचली अदालतों की कार्यपालिका को जब-तब अनावश्यक निर्देश देने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।

संविधान में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उनके अधिकारों और सीमाओं का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों में जब भी कोई एक अपनी सीमाओं से बाहर जाने की कोशिश करता है तब दूसरे स्तंभों से उसके टकराव की नौबत आ जाती है। इससे अनावश्यक बदमजगी पैदा होती है और स्वस्थ परंपराओं का विकास नहीं होता।

मोटे तौर पर विधायिका का काम कानून बनाना, कार्यपालिका का उन पर अमल करना और न्यायपालिका का काम यह देखना है कि कानून सही हैं या नहीं या फिर उन अमल पर ठीक से हो रहा है कि नहीं। लेकिन निचले स्तर पर कुछ उत्साही जज और दूसरे न्यायिक अधिकारी अक्सर ऐसे फैसले करते और निर्देश देते रहते हैं जिससे प्रतीत होता है कि वे कार्यपालिका को चलाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे फैसलों और निर्देशों से अक्सर कार्यपालिका या सरकार के कामकाज में दखल होता है और उसका मनोबल भी प्रभावित होता है।

न्यायपालिका का काम यह कतई नहीं है कि सरकार अमुक काम करे या न करे। उसका काम तो मात्र यह देखना है कि मौजूदा कानूनों का ठीक से पालन हो रहा है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बाद निचली अदालतों से यह अपेक्षा की जाना स्वाभाविक है कि वे ऐसा कुछ नहीं करेंगी जिससे लगे कि वे अपनी सीमा से बाहर जा रही हैं। अगर किसी मामले में उन्हें सरकारी निकायों को दिशा-निर्देश देने की जरूरत लगती भी है, तो बेहतर होगा कि वे ऐसे मामले ऊंची अदालतों के सुपुर्द कर दें।





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