आलेख. आगामी लोकसभा चुनाव लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लड़ने के भाजपा संसदीय बोर्ड के निर्णय के बाद आडवाणी ने पार्टी में नंबर वन की हैसियत फिर पा ली है। यह कोई नई घटना नहीं है बल्कि भाजपा के नेतृत्व के विरासत की निरंतरता ही है। अपने जन्म से अब तक भाजपा अटल और आडवाणी के नेतृत्व से बाहर नहीं आ पाई है।
बीच-बीच में पार्टी का नेतृत्व अन्य नेताओं को सौंपा जरूर गया लेकिन उनमें से कोई भी न तो जनता में ठीक-ठाक पहचान बना पाया और न पार्टी में पकड़ मजबूत कर पाया। पार्टी अध्यक्ष का पद अन्य हाथों में महज तकनीकी रूप से गया, निर्णय के सारे सूत्र अटल-आडवाणी में सिमटे रहे।
राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी चुनाव के लिए आडवाणी को नेतृत्व सौंपना भाजपा में नेतृत्व और विकल्प के अभाव को भी दर्शाता है। लगभग दो साल के अपने कार्यकाल में राजनाथ सिंह यह विश्वास नहीं दिला पाए कि उनमें पार्टी को लोकसभा चुनाव लड़ाने की क्षमता है। वे पार्टी अध्यक्ष के रूप में कमोबेश डमी ही बने रहे हैं। 80 वर्षीय आडवाणी का कोई विकल्प नहीं होना भाजपा के ‘गैलेक्सी ऑफ लीडर्स’ के दावे की भी कड़वी हकीकत है।
भारतीय चुनावी राजनीति सर्वथा व्यक्तिवादी रही है। दल, विचारधारा और कार्यक्रमों से अधिक नेतृत्व का करिश्मा चुनाव परिणामों को प्रभावित करता रहा है। इसी के चलते भाजपा को काफी समय से एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जिसकी देशव्यापी अपील हो। उसके पास वाजपेयी के बाद आडवाणी के अलावा कोई ऐसा चेहरा है ही नहीं। लिहाजा लंबी कशमकश के बाद भाजपा व संघ को उन्हीं के नाम पर मुहर लगानी पड़ी।
जिन्ना पर पाकिस्तान में दिए अपने बयान के कारण संघ के कोप का शिकार होकर जब उन्हें दो साल पहले पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी, तब उनका उत्तराधिकार खतरे में पड़ गया था लेकिन नंबर वन बनने का उनका संघर्ष कमजोर नहीं हुआ था। भाजपा व संघ के भीतर आडवाणी समर्थकों का बहुमत होने की वजह से पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ने के बाद भी वे नेता प्रतिपक्ष बने रहे और अब पार्टी को उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा करना पड़ी।
लोकसभा चुनाव में पार्टी की अगुवाई आडवाणी के हाथों में आने से यह मानने का कोई कारण नहीं दिखता कि पार्टी की रीति-नीति में या स्वरूप में कोई बड़ा परिवर्तन आएगा, सिवाय इसके कि यदि केंद्र में भाजपा की सरकार बनती है तो आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की इच्छा पूरी होने का रास्ता साफ हो जाएगा। आडवाणी को नेतृत्व सौंपे जाने से भाजपा में नए समीकरण बनने की भी कोई संभावना नहीं है। अलबत्ता पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की स्थिति कुछ और कमजोर होने के साथ पार्टी के निर्णयों पर आडवाणी की पकड़ मजबूत हो जाएगी।
तकनीकी रूप से राजनाथ पार्टी अध्यक्ष बने रहें लेकिन व्यावहारिक रूप से आडवाणी ही पार्टी के सर्वेसर्वा हो जाएंगे। भाजपा आंतरिक रूप से नेतृत्व तथा अंत:विरोध के संकट से गुजर रही थी जिस पर काबू पाने तथा संघ को साथ लेकर चलने की कला में आडवाणी अनुभवसंपन्न नेता हैं।
पार्टी में एक छोटा-सा धड़ा लगातार आडवाणी का विरोधी रहा है जिसके चलते ही भोपाल में संपन्न राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आडवाणी को नेतृत्व सौंपने की रणनीति फ्लॉप हो गई थी। इस धड़े के पास अब आडवाणी के साथ कदमताल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा।
भाजपा संसदीय बोर्ड के निर्णय के पहले संघ के सह कार्यवाह मोहन भागवत की आडवाणी से मुलाकात को उनके प्रति संघ के समर्थन के रूप में भले ही देखा जाए, लेकिन यह भी सही है कि भाजपा के मामले में पिछले कुछ समय से संघ की भूमिका गौण होती जा रही है जिसे संघ की सक्रिय राजनीति से हाथ खींचने की रणनीति का नाम दिया जा रहा है। आडवाणी की अगुवाई को अटल युग की समाप्ति के रूप में भी नहीं देखा जा सकता।
अटल व आडवाणी की छवि, तेवर और शैली में जमीन-आसमान का अंतर होने के बाद भी दोनों का युग एक ही रहा है और आडवाणी के लिए नरंेद्र मोदी बनना संभव नहीं है। जहां तक हिंदुत्व की बात है तो भाजपा के लिए इसके एजेंडे से बाहर निकलना न पहले संभव था और न आज है।
यह और बात है कि सत्ता में आने के लिए वह समझौते करती रही है और करती रहेगी। जहां तक गठबंधन का प्रश्न है तो यह छिपा तथ्य नहीं है कि जॉर्ज, नीतीश, जयललिता आदि नेताओं को एनडीए गठबंधन में लाने में आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वैसे भी राजनीतिक गठबंधन का विचारधारा या नीतियों से कोई खास सरोकार नहीं रहा है।
सत्ता के साथ गठबंधन बनना और मजबूत होना तथा सत्ता से बाहर होने पर बिखराव का अनुभव नया नहीं है। अत: आडवाणी के नेतृत्व से एनडीए गठबंधन पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका का कोई आधार नहीं दिखता। अचानक संसदीय बोर्ड बुलाकर आडवाणी के नेतृत्व पर मुहर लगाने को फौरी तौर पर गुजरात चुनाव, विशेषकर नरंेद्र मोदी से जोड़ा जा सकता है लेकिन यह यहीं तक सीमित नहीं है।