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कांग्रेस क्यों बने वाम दलों के हाथों का खिलौना

दृष्टिकोण.fight माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने केंद्र सरकार पर अचानक नया गोला दाग दिया है। उन्होंने सरकार से कहा है कि वह विएना के परमाणु अभिकरण से बातचीत बंद करे और नहीं करेगी, तो वे दिसंबर के बाद सरकार गिरा देंगे। करात की यह धमकी बिन बादल बरसात की तरह दिखाई पड़ती है, लेकिन असलियत कुछ और ही है।

पिछले माह जब करात ने केंद्र सरकार को अंतरराष्ट्रीय अभिकरण से बातचीत की इजाजत दी थी, तो नंदीग्राम उनके गले की फांस बना हुआ था। केंद्र सरकार चाहती तो वह प. बंगाल की सरकार को बरखास्त भी कर सकती थी। राज्यपाल गोपाल गांधी और माकपाइयों के वाक्युद्ध ने तवा एकदम गर्म कर दिया था।

माकपाइयों ने जब सरकार को भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते पर बातचीत की इजाजत दी, तो सबको हैरत हुई थी। आखिर यह छूट क्यों दी जा रही है? जिस गांव जाना नहीं, उसका रास्ता क्यों पूछा जा रहा है? माकपाई कोई गली निकालने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा लोग मानने लगे थे।

कांग्रेसी नेताओं ने यह कहना भी शुरू कर दिया था कि अब भारत-अमेरिकी एटमी करार को परवान चढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। माकपा नेताओं की स्थिति हास्यास्पद लगने लगी थी। माना यह जा रहा था कि कांग्रेस और माकपा की जो कमेटी बनी है, वह कोई न कोई रास्ता निकाल लेगी। लेकिन माकपा का असली रूप अब पता चल रहा है। नंदीग्राम अखबारों के पिछले पन्नों में चला गया है।

अब माकपा को कांग्रेस की कृपा की जरूरत नहीं रह गई है। इस कारण उसने फिर मोर्चा खोल दिया है। अब सफाई यह दी जा रही है कि माकपा भाजपा को मजबूत नहीं बनाना चाहती थी इसीलिए उसने सरकार नहीं गिराई। माकपा और दूसरे वामपंथी नहीं चाहते थे कि गुजरात में कांग्रेस की दुर्गति हो।

अगर वे सरकार गिरा देते, तो वे मोदी की जीत के कारण बनते। अब उन्हें सरकार गिराने में कोई संकोच नहीं है। अब भी माकपाई यह मानने को तैयार नहीं हैं कि नंदीग्राम के कारण वे कांग्रेस के आगे पसर गए थे। विदेश नीति के इतने महत्वपूर्ण मुद्दे को माकपा ने अपनी स्थानीय राजनीति का खिलौना कैसे बनाया, यह अब साफ हो गया है।

माकपा के इस पैंतरा-पलट से भारत का, कांग्रेस का और उसका खुद भी काफी नुकसान हुआ है। अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत-अमेरिकी करार को लेकर दोबारा जो आशा जगी थी, वह धराशायी हो गई है। इससे भारत की साख को बट्टा लगेगा। कांग्रेस भी बुद्धू बनकर फिर से असहाय-निरुपाय हो गई है। उसकी इस अनाथ-छवि का राजनीतिक प्रभाव काफी बुरा होगा।

यदि वह इस सौदे को छोड़ेगी, तो उसका पानी ही उतर जाएगा। वह शासन करने लायक नहीं रहेगी और यदि वह इस सौदे से चिपकी रहेगी, तो उसे कुर्सी छोड़नी पड़ेगी। जहां तक वामपंथियों का सवाल है, उनके कड़े रवैए ने उनकी जो राष्ट्रवादी छवि बना दी थी, वह चूर-चूर हो गई है।

अब वे समझौतावादी और चालबाज की तरह जाने जा रहे हैं। यदि वे अपनी मूल राय पर टिके रहते, तो उन्हें केरल और बंगाल के बाहर भी लोकप्रियता हासिल होती और वे कोई अखिल भारतीय पार्टी का रूप धारण कर लेते। उन्हें राष्ट्रहितों की रक्षा की दृष्टि से भाजपा से भी बेहतर माना जाता, क्योंकि इस मुद्दे पर भाजपा भी गोते खाती रही है।

अब भी वामपंथी नट-चाल चलते रहे, तो उनकी खैर नहीं है। नंदीग्राम ने बंगाल में तथा भ्रष्टाचार और फूट ने केरल में उनकी जड़ें हिला दी हैं। यदि वे परमाणु सौदे पर कोई नई पैंतरेबाजी करेंगे तो अगले चुनाव में वे और सिकुड़ जाएंगे। उनकी साख बिल्कुल पेंदे में बैठ जाएगी। अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है।

अगर गुजरात में मोदी हार गए तो वामपंथियों को यह कहना पड़ेगा कि भाजपा की हार का माहौल बन गया है, इसलिए सरकार गिराना और चुनाव करवाना जरूरी है और यदि मोदी जीत जाएं तो भी वे यह कह सकते हैं कि कांग्रेसनीत यूपीए सरकार सांप्रदायिकता से लड़ने में असफल रही है, इसलिए उसे जाना ही चाहिए। मोदी की जीत का बहाना बनाकर अगर वामपंथी इस सरकार को दोबारा छूट देंगे, तो वे अपनी जड़ों में मट्ठा डाल लेंगे।

तो फिर क्या जनवरी 2008 में सरकार गिरकर ही रहेगी? लगता तो ऐसा ही है, लेकिन इसका उलट भी हो सकता है। कैसे हो सकता है? इस तरह हो सकता है कि परमाणु करार को सरकार खुद ही ताक पर धर दे। वह कह दे कि वह इस सौदे को अगले चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाएगी और दोबारा चुने जाने पर इसे लागू करेगी। यह जानते हुए जिसे गठबंधन में आना होगा, आएगा, जिसे नहीं आना होगा, नहीं आएगा।

जाहिर है कि सरकार का यह पैंतरा वामपंथियों की बोलती बंद कर देगा। उनके पास समर्थन खींच लेने का कोई बहाना नहीं रह जाएगा। अब जो लगभग साल भर की अवधि सरकार के हाथ में रहेगी, उसका इस्तेमाल वह देश के गरीबों, ग्रामीणों, पिछड़ों और दलितों की सच्ची सेवा में लगाएगी तो शायद उसे इतनी सीटें मिल जाएं कि उसे कम्युनिस्टों के समर्थन की जरूरत ही न रह जाए।

इसके विपरीत अगर वह इस सौदे पर टूट जाए तो देश का कोई हित नहीं होगा। गिरी हुई सरकार या कामचलाऊ सरकार को इस सौदे पर हस्ताक्षर करने का कोई अधिकार नहीं होगा। जिस सौदे के कारण सरकार गिरी, उसी पर वह दस्तखत कैसे करेगी? यदि करेगी तो चुनाव में उसका कबाड़ा हो जाएगा।

लोग मानेंगे कि कांग्रेस सरकार भारत की संसद की नहीं, राष्ट्रपति बुश की चाकर है और अमेरिका की कठपुतली है। उसका संचालन दिल्ली से नहीं, वाशिंगटन से होता है। बैठे-बिठाए ऐसी बदनामी कांग्रेस पार्टी मोल क्यों लेना चाहेगी?

दूसरे शब्दों में अगर सरकार गिराकर भी यह सौदा नहीं हो सकता, तो फिर सरकार चलाए रखकर इस सौदे को क्यों न टाल दिया जाए? यूं भी यह सौदा इस लायक नहीं है कि इसके कारण सरकार गिरा दी जाए। यह अगर संपन्न हो भी जाए तो इससे भारत को कम, अमेरिका को ज्यादा लाभ है। इस सौदे की बहस ने भारत और कांग्रेस पार्टी को जितना नुकसान पहुंचाया है, अमेरिका और वाम दलों को उतना ही फायदा पहुंचाया है।

सौदे पर डटे रहकर क्या कांग्रेस पार्टी अपने आपको 100 सांसदों से भी कम की पार्टी बनाने पर आमादा है? इस सौदे में ऐसा क्या है जिसकी वजह से कांग्रेस अपने इतिहास के निम्नतम बिंदु पर पहुंचना चाहती है? वह कम्युनिस्टों के हाथों का खिलौना क्यों बनना चाहती है?





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