सम्पादकीय.
भारतीय जनता पार्टी ने लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके और आगामी लोकसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ने की घोषणा करके एक साथ कई निशाने साधे हैं। उसने वाजपेयी बनाम आडवाणी के द्वंद्व पर पूर्ण विराम लगा दिया है, दूसरी पीढ़ी के अपने महत्वाकांक्षी नेताओं के बीच नेतृत्व के प्रत्याशित संघर्ष को फिलहाल टाल दिया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ मतभेदों के सुलझ जाने का संकेत दिया है, खुद को चुनाव के मोड में डाल दिया है और इन सबसे ऊपर कांग्रेस को अपने नेता के नाम की घोषणा करने की खुली चुनौती दी है।
वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी को न केवल भाजपा, बल्कि संघ परिवार में भी बेहद आदर-सम्मान से देखा जाता है। जनसंघ के काल में भले ही वाजपेयी नेता और आडवाणी अनुयायी रहे हों मगर उसके दूसरे संस्करण भाजपा में दोनों अटूट जोड़ी के रूप में उभरे। वाजपेयी की भाषण कला और आडवाणी के संगठन कौशल की वजह से ही पार्टी का जनाधार व्यापक हुआ।
यदा-कदा दोनों के बीच मतभेदों को लेकर खूब कयास भी लगाए जाते रहे, मगर वे परवान नहीं चढ़ सके। अब ढलती उम्र और बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से वाजपेयी की सक्रियता घटी है तो लगभग हमउम्र मगर स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर आडवाणी को आगे किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है।
भाजपा के दूसरी पीढ़ी के नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और उनके द्वंद्व को लेकर भी जब-तब अटकलें लगाई जाती रही हैं। पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बेहतर तालमेल करने में तो सफल रहे हैं मगर वे अभी तक अपनी मास अपील साबित नहीं कर पाए हैं।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के राज्य विधानसभा चुनावों के बाद देर-सवेर राष्ट्रीय राजनीति में उतरने के बारे में काफी चर्चा होती रही है, मगर पार्टी नेताओं के एक बड़े वर्ग द्वारा दबे-छुपे उनकी कार्यशैली पर अंगुली उठाते रहने की वजह से उनकी स्वीकार्यता सीमित है। इनके साथ ही अगली कतार में आने के लिए तैयार बैठे दूसरी कतार के अन्य नेताओं को भी फिलहाल इंतजार करना होगा।
कायद-ए-आजम जिन्ना पर जिस प्रशंसात्मक टिप्पणी को लेकर आडवाणी संघ नेतृत्व की आंखों की किरकिरी बने थे वह टिप्पणी और उससे उठा विवाद अब इतिहास की बात बन चुका है। अनुभवी आडवाणी भाजपा के उस छोटे से धड़े को भी साथ लेकर चलने की क्षमता रखते हैं जो यदा-कदा उनकी मुखालफत करता रहा है।
एनडीए में अपनी स्वीकार्यता बनाना और नई पार्टियों को जोड़कर उसका विस्तार करना उनके सामने जरूर एक चुनौती है। आगामी लोकसभा चुनाव में आडवाणी भाजपा को 1996 और 1998 जैसी ऊंचाइयों पर पहुंचा पाते हैं या नहीं, यह देखना पूरे देश के लिए उत्सुकता और कौतूहल का विषय रहेगा।