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स्पंज आयरन उद्योगों के खिलाफ अघोषित नाकेबंदी

spongeबिलासपुर: पर्यावरण के मामले कोरबा, रायपुर व रायगढ़ के मुकाबले बिलासपुर अच्छी स्थिति को स्थायी रखने के जिला प्रशासन व उद्योग विभाग के अधिकारियों में आपसी सहमति बन गई है। अधिकारियों की मानें तो अब नए स्पंज आयरन उद्योग इस जिले में नहीं लगने दिए जाएंगे।

प्रदेश में आई स्पंज आयरन उद्योगों की बाढ़ ने रायपुर के वातावरण में अच्छा-खासा फर्क लाया। सिलतरा में स्थिति यह हुई कि यहां की कृषी भूमि पूरी तरह से बरबाद हो गई। इसके खिलाफ बने जबरदस्त माहौल के बाद कहीं जाकर मामला कुछ सुधार में आया। ईएसपी लगवाकर कुछ हद तक प्रदूषण को कम करने का प्रयास किया गया। रायपुर की तर्ज पर बिलासपुर में भी एक समय बड़ी संख्या में स्पंज आयरन खोलने के लिए आवेदन लगे। वर्तमान में 9 स्पंज आयरन उद्योग ही संचालित हैं। इन उद्योगों का भी जमकर स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ। इसके बाद सभी स्पंज आयरन उद्योगों पर दबाव बनावकर ईएसपी तो लगवा ही लिया गया। अधिकारियों की मानें तो पहले की अपेक्षा अभी शिकायत बहुत कम है और पूर्व की अपेक्षा वर्तमान में पर्यावरण की स्थिति अच्छी है।

पर्यावरण की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अधिकारी यह दावा कर रहे हैं कि रायगढ़, रायपुर व कोरबा की तुलना में बिलासपुर का पर्यावरण की स्थिति बहुत अच्छी है। उद्योग विभाग व जिला प्रशासन के अधिकारी इसे बनाए रखना चाहते हैं। 9 के बाद अब आने वाले समय में स्पंज आयरन का भी एक भी और उद्योग न आए, इसके लिए अधिकारियों में आपसी सहमति बन गई है। उद्योग विभाग से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार जिला प्रशासन ने आने वाले समय में बिलासपुर में एक भी स्पंज आयरन न खुलने न देने का निर्णय ले लिया है। इस निर्णय की घोषणा से भले ही परहेज यिा जा रहा हो, लेकिन इस अघोषित निर्णय को अमल में लाने के लिए अधिकारी अपनी तरफ से पूरा जोर लगाए हुए हैं। इसी का परिणाम है कि पिछले दो साल से एक भी नया स्पंज आयरन उद्योग बिलासपुर में चालू नहीं हो सका है। अगर एक या दो उद्योग ने आवेदन भी किया था उसे किसी न किसी बहाने टरका दिया गया। इस तरह छत्तीसगढ़ में बिलासपुर को पर्यावरण के मामले बस्तर व सरगुजा को छोड़ दें तो बाकी क्षेत्र की तुलना में सबसे ज्यादा सुरक्षित और व्यवस्थित रखने की दिशा में लगातार काम चल रहा है।

स्पंज आयरन उद्योग मूल रूप से कोयले पर आधारित उद्योग है और इससे निकलने वाली डस्ट से आसपास क्षेत्र में बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है और उद्योग के अगल-बगल होने वाली खेती तो बरबाद ही हो जाती है। इससे कुछ हद तक ईएसपी लगाकर अवश्य बचा जा सकता है। इसके बाद भी उस क्षेत्र का तापमान बढ़ने की बात तो अधिकारी स्वीकार करते ही हैं। इन सब को देखते हुए ही जिला प्रशासन ने नाकेबंदी पर आंशिक सहमति बना ली है। जिले में चल रहे स्पंज आयरन उद्योगवर्तमान में जिले में नोवा, राधे इंडस्ट्री, शकुन स्पंज आयरन, एरन स्टील, गीतांजलि इस्पात, आभा पावर, अरोरा सीजे, शिवम इंडस्ट्री व राधा माधव नाम के स्पंज आयरन उद्योग चल रहे हैं। इन उद्योगों से भी उस क्षेत्र का पर्यावरण लगातार प्रभावित तो हो ही रहा है।स्पंज आयरन की विदेशों में मांगस्पंज आयरन की सबसे ज्यादा मांग विदेशों में है। भारत से बड़ पैमाने में स्पंज आयरन विदेशों में एक्सपोर्ट किया जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि इन उद्योगों से होने वाले प्रदूषण को देखते विदेशों में स्पंज आयरन का प्लांट डालने की अनुमति ही नहीं दी जाती है। सीधे बना-बनाया स्पंज आयरन खरीदकर उससे लोहा बना लिया जाता है और अपने देश के पर्यावरण सुरक्षित रखा जाता है। वहीं हिंदुस्तान में पर्यावरण की चिंता किए बिना धड़ल्ले से स्पंज आयरन उद्योग लगाए जा रहे हैं। 11 अनु 2





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