Election
Election Diary Election Diary अहमदाबाद.
चुनाव एक तरह से नेताओं का वजन नापने का तराजू है और साथ-साथ प्रजा का फोटो भी खींचता है। लेकिन सच्ची छवि तभी दिखती है जब ज्यादा मतदान हो।
यह संयोग की बात है - पिछले बुधवार रात्रि बजे टी.वी. पर चुनाव का कवरेज देखने के बाद वर्ल्ड स्पेस रेडियो चालू करते ही चुनाव सभा के दौरान एक उत्तेजित गीत को सुना :
हम देखेगें.. हम जाएंगें. निश्चित ही है कि हम जाएंगे। जुल्म और सितम के पहाड़ रूई की तरह उड़ जाएंगे हमारे कुचले हुए पांव तले जब धरती धक-धक धड़केगी और शासकों के सिर पर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी हम देखेंगे.. सब पुतले उठवाए जाएंगे सब ताज उछाले जाएंगे। सब तख्त गिराए जाएंगे। हम देखेंगे..
इतना गुस्सा क्यूं, किस पर, किस लिए गुस्सा चढ़ा इन सबकी खोज की तो मालूम पड़ा कि यह तो पाकिस्तान की नाराज प्रजा शोर-शराबा कर रही थी। गायिका इकबाल बानो की आवाज के साथ लोगों की किलकारियां इंकलाब जिंदाबाद के बुलंद नारे और एक-एक लोगों का वन्स मोर. कहना, इन सबके पीछे का रहस्य यह था कि पाकिस्तानी शासन के प्रति नाराज प्रजा को फैज अहमद फैज के इस गीत में उनके दिल की आवाज सुनाई पड़ रही थी।
मुद्दा यह था कि एक तरफ तो पाकिस्तान है , जिसमें लोकशाही शासन का कोई मेल मिलाप नही है। यहां लोकशाही शासन आए या ना आए लश्कर आकर बैठ गई है। दूसरी तरफ भारत है जहां लोकशाही शासन का अच्छा नमूना दिख रहा है तो दूसरी तरफ यहां शासन सत्ता को पैतृक संपत्ति समझने वाले नेता भी है।
यहां कौन शासक शासन करेगा यह बात काफी उदासीन है। यहां एक बड़ा वर्ग है तो दूसरी तरफ जोश से भरी मायावती को जिताने लिए बड़ी मात्रा में दलित-सवर्ण भी हैं। और गुजरात? यहां हाईवे-लाईटें-मॉल-मल्टीप्लेक्स चकाचक हैं, तो कहीं खेत के खेत साफ हैं। यहां सुरक्षा इतनी चुस्त-दुरुस्त है कि यहां की महिलाएं और लड़कियां आधी रात तक घूम-फिर सकती हैं। लेकिन फिर भी दूसरी तरफ इतनी असुरक्षा भी है कि दिन में भी यहां के लोगों के मन में बाहर निकलते समय एक डर सा बना रहता है।
यहां की प्रजा में आगे बढ़ने की होड़ और विकास को पाने के लिए समझदारी के साथ-साथ वहीं धर्म-कौम-जाति जैसे मामलों के पीछे समय खराब करने का उत्साह भी है। यहां 2007 में मोदी सरकार के द्वारा रोकाणकारों के साथ 4.50करोड़ का एमओयु पर साइन करने का जोश भी है, तो दूसरी तरफ इन्वेस्टमेंट के लिए 2005 में साइन हुआ 1.30 लाख करोड़ का एमओयु प्रोजेक्ट जिसमें सिर्फ10000 करोड़ का इन्वेस्टमेंट होने का मामला भी आ रहा है। यहां ऐफिल टॉवर जैसा ऊंचा नर्मदा बांध है तो दूसरी तरफ यहां खेत की पर्याप्त सिंचाई के लिए 18.44लाख हेक्टेअर पानी का लक्ष्यांक है जिसमें सिर्फ 1.14लाख हेक्टेअर खेत की सिंचाई के लिए नर्मदा से पानी मिलने का अफसोस भी है।
यहां भाजपा के नरेन्द्र मोदी इस तरह से छा गए हैं जैसे पूरे गुजरात चुनाव में हो रहे 187 सीटों के चुनाव के लिए वही एक उम्मीदवार हैं। यहां भाजपा एक टीम है तो दूसरी टीम कांग्रेस की है लेकिन इनमें मुख्य कौन है अभी निश्चित नही है। यहां कट्टर हिन्दुत्व की जय-जयकार भी है तो दूसरे पक्ष में कट्टरता को सुनकर हाहाकार भी है। तो सवाल यह है कि इस बहुरंगी चित्रों में कौन, क्या, कहां है? यह एक सन्देहात्मक बात है। लेकिन चिन्ता की बात नहीं इन रंगोली के समस्त रस्तों पर जाने का एक मात्र रास्ता है चुनाव का। तो दो ताली चुनाव आ गया।
जैसा कि इस साल के चुनाव प्रचार में ज्यादा कहासुनी और ज्याद गरमागरमी देखने को नहीं मिली रही है। दक्षिण गुजरात के मांगरोल में चुनाव सभा के दौरान सोराबुद्दीन मुद्दे पर सवाल उठने के बाद सभा में नारेबाजी हुई और गरमागरमी हुई।
तो सौराष्ट्र के मांगरोल पर कौन पीछे रहेगा? कांग्रेस की उम्मेद्वार चन्द्रिका प्रजा के सामने -अगर आप लोगों ने मुझे वोट नही दिया, और अगर मैं हार गई तो जहर पीकर आत्महत्या कर लूंगी..बाद में तेरहवें दिन आ जाना। इस प्रकार से सभा में बोलने के बाद इस मुद्दे पर काफी शिकायतें हुई, गरमागरमी हुई लेकिन इन बातों के अलावा इस बार के चुनाव में कुछ भी नहीं हुआ। इससे तो ज्यादा दीवाली पर -ओम शान्ती ओम- और -सांवरिया- के बीच कश्मकश देखने को मिली।
लेकिन कोई बात नहीं। प्रचार में गरमागरमी नही हुई इससे तो कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन यदि मतदान के समय भीड़ नही हुई तो फर्क पड़ेगा। बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा। यह चुनाव कैसा है? नेताओं के वजन मापने का तराजू? हां यह तो वजन मापने का तराजू है, इसके अलावा चुनाव एक ऐसा कैमरा भी है जो प्रजा की फोटो खींचता है। लेकिन पूरा फोटो सही तब होगा जब १क्क् प्रतिशत मतदान हो। तो यही लक्ष्य रखना है। १क्क् प्रतिशत मतदान।
उपर लिखी गुजरात की पंचरंगी खूबी का समग्र चित्र स्पष्ट होता है। जरा सोचो, बच्चे के पैदा होने के बाद वह महीना-महीना, साल-दर साल कितने रूप बदला, उसका कितना विकास हुआ इन सब का चित्र हम उतारते रहते हैं। तो एक प्रजा के रूप में हम कितने विकसित हुए है इसकी जानकारी 5-5 वर्ष में होनी चाहिए की नहीं।
आगे के लिखे गीत -हम देखेंगे- एक आशावादी भाव लगता है इसके बदले -हम दिखाएंगे- ऐसे जोश के साथ गुजराती प्रजा को मतदान करना चाहिए। गुजरात हमेशा विकसित होता रहे, सुरक्षित और शानदार, विकसित राज्य बने ऐसी आशा रखनी चाहिए। भगवान महान हैं।
जो संपूर्ण सृष्टि का ध्यान रखने वाला है वही गुजरात का भी ध्यान रखेगा। लेकिन इनके हाथ तो हम ही हैं। उनका हाथ पैर बनकर काम हमें ही करना है, तो चलो जिसका दूसरा नाम सत्य है, उस परमात्मा के सत्य को साकार करने वाले हाथ बनकर मतदान करें। हाथ को उपर नहीं करना है। नहीं तो मदद मांगने के समय वो हाथ खड़े कर देगा और पूछेगा कि क्यों मतदान के समय तो खोये-खोये चांद हो गये थे।