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निरंकुश संस्कृति की कोख से उपजी हिंसा

दृष्टिकोण. वैश्वीकृत सुपरमॉल संस्कृति के मॉडल साइबर सिटी गुड़गांव के यूरो इंटरनेशनल स्कूल की आठवीं कक्षा के दो छात्रों द्वारा अपने सहपाठी को गोलियों से भून निरंकुश संस्कृति की कोख से उपजी हिंसाडालने की घटना ने पुराने सवालों को नए रूप में पेश किया है। इस खबर से मेरे दिमाग में सवाल कौंधा-क्या ऐसी घटना किसी सरकारी स्कूल में घट सकती थी? यह सवाल इसलिए मायने रखता है चूंकि देश के दस लाख से अधिक सरकारी स्कूलों के बच्चों की वर्ग पृष्ठभूमि यूरो इंटरनेशनल के बच्चों से बिल्कुल भिन्न है। वे अपने स्कूलों में शोफरवाली आलीशान गाड़ियों में नहीं जाते वरन पैदल, साइकिल से या सार्वजनिक बसों में लटकते हुए जाते हैं। उनके पास न मोबाइल, मोटरबाइक हैं और न ही कंप्यूटर गेम्स खेलने के लिए कंप्यूटर। उनके मां-बाप प्रॉपर्टी डीलर, उद्योगपति और राजनेता नही हैं वरन वे मेहनतकश मजदूर, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, बुनकर, मछुआरे और छोटे किसान हैं। इनमें से अधिकांश असंगठित उत्पादन में जुटे हुए हैं और अजरुन सेनगुप्ता आयोग की रपट के अनुसार प्रतिदिन महज बीस रुपए से कम खर्च करके जिंदा हैं।

अंग्रेजियत में पले यूरोप-अमेरिका की ओर पलायन करने की इच्छा रखने वाले भारत के सवर्ण और संपन्न वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे दलित, आदिवासी, अति पिछड़े और मुस्लिम समुदायों के हैं, हर समुदाय की अधिकतर लड़कियां हैं। लेकिन यह मानना रूमानियत होगी कि सरकारी स्कूलों में यह घटना नहीं घट सकती चूंकि वैश्वीकृत संस्कृति के प्रभाव का प्रतिरोध करने की गरीब तबके की ताकत का लगातार हनन हो रहा है।

सवाल यह है कि भारत की सालाना दस फीसदी की दर से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था ने जो नव-धनाढ्य वर्ग पैदा किया है उससे किस प्रकार की निरंकुश संस्कृति का निर्माण हो रहा है। निर्बाध उपभोगवाद की संस्कृति में पलने वाले बच्चों में संवेदना और अन्य मानवीय मूल्यों का स्रोत क्या होगा? अपने सामाजिक परिवेश से या तो पूरी तरह कटे हुए या फिर उसके प्रति हीनभाव रखने वाले बच्चे संवेदनशून्य और आत्मतुष्ट होने के अलावा और क्या हो सकते हैं? जहां बचपन हिंसा से जुड़े खिलौनों, काटरूनों और कंप्यूटर गेम्स के बीच गुजरा हो और किशोरावस्था मोबाइल से अश्लील तस्वीरें उतारते और मोटरबाइक पर सवार होकर मर्दानगी दिखाते हुए दुनिया पर राज करने का अहम पैदा करती हो, वहां अपने सहपाठी को गोलियों से भूनना कोई हैरत की बात नहीं होना चाहिए।

बॉलीवुड की फिल्मों ने हिंसा के केवल नए तरीकों को ही ईजाद नहीं किया वरन उनको मर्दानगी से भरपूर सहस्राब्दी के महानायक का प्रतिरूप बना दिया। इस छवि के तले सभी सामाजिक और पारिवारिक मूल्य दब गए और विकृत राजनीतिक मूल्यों की स्थापना हुई जिसमें दिल्ली (1984), गोधरा (2002) और नंदीग्राम (2007) की हिंसा के बावजूद राजनेताओं की छवि पर कोई आंच नहीं आई वरन उनका कद और बढ़ा। जब वैश्वीकृत भारत के ये नए रोल मॉडल हों तब हमारे स्कूल भी अमेरिका के स्कूलों की राह पर क्यांे नहीं चलेंगे जहां पिछले एक दशक में यूरो इंटरनेशनल जैसी दिल दहला देने वाली 17 वारदातें हो चुकी हैं। आज की अर्थव्यवस्था में धन पैदा करने की बेतहाशा दौड़ से उपजी इन तमाम विकृतियों को चुनौती दी जा सकती थी यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था बराबरी, सामाजिक न्याय, संवेदना और प्रबुद्ध लोकतंत्र की बुनियाद पर खड़ी होती। लेकिन संविधान में अपेक्षित इन सभी सिद्धांतों का शिक्षा व्यवस्था खुलकर उल्लंघन करती है।

उदाहरण के लिए कोठारी आयोग की 40 साल पुरानी समान स्कूल प्रणाली स्थापित करने की सिफारिश के बावजूद गैर-बराबरी बढ़ाने वाले और समाज को खंडित करने वाले महंगे अभिजात स्कूलों को सरकार ने प्रोत्साहन दिया है। कोठारी आयोग के शब्दों में अभिजात स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा बेहद कमजोर शिक्षा होगी, चूंकि यह देश के अधिकांश समाज के यथार्थ से कटी होगी। यानी ये बच्चे मेहनतकश अवाम की जिंदगी से अनभिज्ञ होंगे, देश की समृद्ध विविधता इनके लिए खास मायने नहीं रखेगी और देशप्रेम व सामाजिक प्रतिबद्धता इनके लिए फूहड़ मजाक होगी।

आखिरकार, इनका गंतव्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सालाना छह-सात अंकों की आय के जरिए उपभोगवाद का भरपूर आनंद लेना और उसके लिए यूरोप-अमेरिका पलायन करना है। इसकी तुलना में उत्पादन में लगे करोड़ों मजदूरों में बराबरी, सामूहिकता और इंसानियत के मूल्य स्वाभाविक तौर पर बनते हैं। ये मूल्य टूटते तभी हैं जब इन अभिवंचित समुदायों का इस्तेमाल शासक वर्ग अपने हित में करता है। समान स्कूल प्रणाली अभिजात तबके के बच्चों को भी इन मूल्यों के संपर्क मंे आने और उनको आत्मसात करने का मौका दे सकती है।

ये अभिजात स्कूल जिस गलाकाट प्रतिस्पर्धा का मूल्य स्थापित करते हैं, उसका परिणाम अपने सहपाठियों पर और बाद में समाज के कमजोर तबकों पर हावी होना हो सकता है। देश का शासकवर्ग इन मूल्यों का समर्थन करता है तभी तो किंडरगार्टन में भी दाखिले के लिए ऐसे नियमों को चलने दिया जाता है जिनके द्वारा वर्ग, जाति, नस्ल, मजहब, लिंग और अंग्रेजियत के आधार पर बच्चों को वंचित किया जा सके। यह परिपाटी आगे की कक्षाओं में महंगी टयूशन और कोचिंग को भेदभाव का आधार बनाती है। प्रधानमंत्री ने इस साल छह हजार उम्दा स्तर के नए स्कूलों की घोषणा की है ताकि केवल वे मुट्ठीभर बच्चे ही आगे बढ़ सकें जिनकी जरूरत नई अर्थव्यवस्था को है। अभिजात तबके के बच्चों को इन छह हजार स्कूलों की जरूरत नहीं है। ऊपर पहुंचने का रास्ता उनके मां-बाप के धन की बदौलत खरीदा जा सकता है।

यह बुनियाद है जिस पर नव-धनाढ्यवर्ग की निरंकुशता पनपती है। इस वर्ग के बच्चे जानते हैं कि कुछ साल पहले दिल्ली में बीएमडब्ल्यू गाड़ी से जिन अमीर किशोरों ने फुटपाथ पर सो रहे मजदूरों की हत्या की थी, आज वे सीना तानकर घूम रहे हैं और अमेरिका में पढ़ रहे हैं। वे जानते हैं कि उनके मां-बाप न्याय प्रणाली और पुलिस व्यवस्था से अंतत: उनको बचा लेंगे। इसलिए निरंकुश होकर अपनी ताकत का अहसास करते और कराते हुए वे मर्दानगी दिखा सकते हैं। सच तो यह है कि गांधी, टैगोर और गिजुभाई के शैक्षिक सिद्धांतों पर लौटने की संभावना निजी और सरकारी दोनों श्रेणी के स्कूलों में नहीं है चूंकि आज की शिक्षा का लक्ष्य वैश्वीकृत दुनिया में भारत को तीसरी महाशक्ति बनाना है, न कि एक समतामूलक, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और प्रबुद्ध समाज का निर्माण करना।





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