अभिमत. राजनीति के गरम तवे पर जब चाहे तब कोई मुद्दा सेंकने वाले अपने देश के राजनीतिक दलों को न तो लोक की परवाह है न ही तंत्र की। परवान पर चढ़ी गुजरात की चुनावी राजनीति के आखिरी दौर में अफजल गुरू की फांसी का मुद्दा आ गया। मोदी कहते हैं कि सोनिया बताएं कि छह साल हो गए अफजल को फांसी क्यों नहीं दी गई।
सोनिया पलटवार करती हैं कि संसद पर हमला करने वाले आतंकवादियों को तो एनडीए सरकार के मंत्री और भाजपा के नेता ही कंधार छोड़ आये थे। सधे हुए सवाल जवाब किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगते।
ऐसे आरोपों प्रत्यारोपों से लोक का क्या भला होगा और तंत्र कितना दुरुस्त होगा कोई नहीं जानता पर अब यह सब जानने लगे हैं कि राजनीतिक दल कुछ ऐसे कर्मकांडों की परंपरा बनाए रखना चाहते हैं कि जब लोगों को मुद्दों से भटकाना हो तो इनका तराना छेड़ दें।
अफजल का मुद्दा 13 दिसंबर को ही क्यों उठता है ये नेता लोग पूरे साल क्यों भूले रहते हैं। 6 दिसंबर को बाबरी-विध्वंस की बरसी के दिन ही नेताओं को देश की धर्मनिरपेक्षता पर खतरा क्यों मंडराता नजर आता है। जब संसद की अवसान बेला आती है तब ही नेताओं को महिला आरक्षण की अचानक क्यों याद आ जाया करती है?
सही मायने में देखा जाए तो राजनीतिक दलों के झंडे और पंडे भले ही अलग-अलग हों पर वास्तव में सभी का मूल चरित्र एक ही है। चुनावों के आयोजन तो महज कुर्सियां और भूमिका बदलने के लिए होते हैं।
चाहे कोई भी दल हो, मूल मुद्दों पर जनता का ध्यान न जाए, कोशिश सभी की यही रहती है। लेकिन ऐसे लोग मुगालते में हैं, जनता राजनीति के हमाम की हकीकत जानती है और इसीलिये नतीजों की पूर्व घोषणा करने वाले चुनावी पंडित हर बार नतीजे आने के बाद झूठे साबित हो जाते हैं।