आलेख.
मध्यप्रदेश में विकास की दिशा और दशा का गहराई से विश्लेषण करे तो हमें विकास के नाम पर खर्च तो बहुत दिखाई देता है, पर बदले में नतीजे बहुत सुखद नहीं है। विकास की इस दिशा को हम विकास की त्रासदी कह सकते हैं। ग्रामीण विकास का लाभ आम ग्रामीण के पास न पहुंच व्यवस्था के दलालों के हिस्से में जा रहा है। उधर, शहरों में समारोही विकास, प्रशासनिक मनमानी और फिजूलखर्ची के शहरी विकास का एक ऐसा साम्राज्य खड़ा हो रहा है जिसमें स्थानीय व्यापार, उद्योग तथा जनजीवन एक अंधी भागमभाग है।
शहरी विकास के नए तीर्थ माल, मल्टी, सीमेंट की सड़कें, फ्लड लाइट, सुपर कॉरिडोर, निजी विश्वविद्यालय, गाजरघास की गति से खुलते नए-नए इंजीनियरिंग कॉलेज, बहुराष्ट्रीय कंपनी के रिटेल बाजार आदि की आपाधापी और जमीन के गगनचुंबी भागों के गुणा-भाग एवं जोड़-घटाव के आंकड़ों में उलझा आम शहरी मन ही मन आपसी अचल संपत्तियों के आर्थिक विकास पर आत्ममुग्ध हो रहा है।
प्रदेश के ग्रामों में रोजगार के अवसर समाप्ति के कगार पर होने से ग्रामीण युवा शहरों में सुरक्षा गॉर्ड बनने, कचरा बीनने, गेहूं खोदने या हम्माली-मजदूरी करने के लिए निकल पड़े हैं। अब उनमें ग्राम विकास का इंतजार करते गांवों में बैठे रहने का धैर्य खत्म हो चुका है।
ग्रामों में समृद्धि लाने का सबसे बड़ा कारक वहां से रोजगार की तलाश में पलायन कर शहरों में श्रम शक्ति से पैसा कमाना और शहरी क्षेत्रों में समृद्धि का सबसे बड़ा कारक अचल संपत्ति के गगनचुंबी भाव, शेयर और बाजार के उत्पादों की खरीदी-बिक्री मुख्य हैं। शहरों में जमीन की खरीदी-बिक्री के सौदे विकास का पर्याय बन गए हैं।
प्रदेश में आवागमन का सस्ता सुलभ साधन म.प्र. राज्य सड़क परिवहन निगम विकास के इंतजार में दम तोड़ चुका है और गरीब ग्रामीण-शहरी जनता जानवरों की तरह जीप, बस में ठूंस-ठूंसकर यात्रा करने को अभिशप्त है। इंदौर की सिटी बस सर्विस की ख्याति में विश्वभर में चर्चा हो रही है पर प्रदेश में राज्य परिवहन की बसें क्यों नहीं चल पाई, यह प्रदेश के विकास के घावकों की चिंता का विषय नहीं है।
नर्मदा पर बांध बना लिए, बिजली बनने वाली हल्ला है पर विशाल बांधों की मुख्य नहरों का निर्माण अभी भी अधर में लटका है। बांधों में बंधी अथाह जलराशि की नर्मदा मां अपने बेटे-बेटियों के खेतों में कब आएगी यह विकास के एजेंडे का सवाल नहीं है। शहर में पहले औद्योगीकरण से कपड़ा मिल की चिमनी से धुएं का उत्पादन होता था अब मोटर वाहनों के विकेंद्रित धुएं का। चौबीस घंटे बारहों महीने गौधुलि बेला है, प्राणायाम के लिए भी प्राणवायु उपलब्ध नहीं है। धूल, धुआं और कचरा शहरी विकास की प्रक्रिया के प्रतीक चिह्न् हैं।
प्रदेश की अधिकांश आबादी गांवों में रहती है, उसमें भी बड़ा हिस्सा आदिवासी गांवों का है। आदिवासी गांवों का अर्थशास्त्र शरीर श्रम, जंगल, जमीन, खेती, बकरी और मुर्गी पर आधारित है जबकि अन्य गांवों का अर्थशास्त्र व्यापार खेती पशुपालन, सट्टा और शराब पर आधारित है। श्रम आधारित आजीविका के लिए गांव छोड़ देने की तत्परता आदिवासी अंचल में ज्यादा है।
ग्रामीण आबादी मूलत: कृषि के उत्पादक कार्य में लगी जमात है पर आधुनिक खेती के संसाधन छोटे किसानों के पास नहीं हैं। उनकी जिंदगी के अर्थशास्त्र ने उसके पास न तो बैलजोड़ी रखने की हैसियत रखी है और न ही ट्रैक्टर रखने की। नतीजा साधनों के अभाव में खेती की उत्पादकता लंगड़ी-लूली हो गई है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाह गांवों के बाजार तक पहुंचने की है पर गांव के छोटे और मझौले किसानों और भूमिहीनों की रोजगार क्षमता या उत्पादकता बढ़ाने का कोई एजेंडा है ही नहीं।
गांवों की अर्थव्यवस्था में घुसकर बाजार का माल सभी बेचना चाहते हैं पर गांवों की उत्पादकता बढ़ाने वाले पानी, बिजली, नहर एवं लोकशक्ति की ऊर्जा का इस्तेमाल प्रतिदिन हो सके, ऐसा कोई विकास का प्रबंधन हमारे आधुनिक विकास के मॉडल के पास नहीं है। प्रदेश में आबादी के विक्रेंद्रित भौगोलिक स्वरूप के कारण तथाकथित नए विकास की अधोसंरचना खड़ी करना संभव नहीं है। इसी का नतीजा है कि आजादी के साठ साल बाद भी लैंडलाइन टेलीफोन और बिजली पहुंचाना संभव नहीं हुआ पर हवाई तरंगों से मोबाइल का खर्च तंत्र जरूर दूरदराज के इलाकों में भी पहुंच बनाने में कामयाब हुआ है।
मध्यप्रदेश जैसे विकेंद्रित भौगोलिक आबादी वाले प्रदेश में शहरी एवं ग्रामीण विकास की प्रक्रिया एक समान एवं लोगों के जीवन को सुखद एवं रोजगारमूलक बनाने के बजाय साइकिल की ट्यूब जो कहीं-कहीं रबर कमजोर पड़ने से सूजन की तरह फूल जाती है, वैसे ही शहरी विकास के मामले में एकाएक फूली हुई और ग्रामीण विकास के टायर के जगह-जगह से फूट जाने के कारण ग्रामों में गेटर लगी हुई विकास यात्रा नजर आती है।
लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।