दृष्टिकोण.
महज 12 महीनों में दिनदहाड़े 113 व्यक्तियों की हत्या करना एक ऐसी उपलब्धि है जिसे गिनीज बुक ऑफ रिकार्डस में शामिल किया जा सकता है। यह उपलब्धि दिल्ली की ब्ल्यू लाइन बसों की है। हालांकि हताश-निराश नागरिक इसके लिए बारी-बारी से ड्राइवरों, पुलिस, नेताओं और यातायात अधिकारियों को दोष देते हैं।
हकीकत में ये सभी दोषी हैं मगर असली समस्या कुछ और ही है। कुछ महीने पहले एक बड़ी हस्ती ने इसके लिए निजीकरण तक को दोषी बताया था जो मेरी नजर में फिजूल की टिप्पणी थी। आखिर दुनिया के कई बड़े शहरों में (इंग्लैंड और फ्रांस के शहरों समेत) निजी कंपनियां शानदार बस सेवाएं दे रही हैं।
दूर न जाएं, अपने ही देश में 20 लाख से ज्यादा की आबादी वाले इंदौर में, जहां राज्य सड़क परिवहन निगम की बेहद घटिया नगर बस सेवा अस्सी के दशक के आखिर में दम तोड़ चुकी थी, 2005 में कलेक्टर बनकर पहुंचे 34 बरस के आईएएस अधिकारी विवेक अग्रवाल ने जो कर दिखाया वह किसी भी शहर के लिए अनुकरणीय है।
विवेक ने बतौर हॉबी दुनिया के कई प्रमुख शहरों की बस सेवाओं का अध्ययन किया था और उन्हें पता था कि एक अच्छी नगर बस सेवा कैसे खड़ी की जा सकती है। उन्होंने फरवरी 2006 में महज 25 लाख रुपए की पूंजी से इंदौर में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भागीदारी में एक बस सेवा की नींव रखी जो दुनिया की बेहतरीन नगर बस सेवाओं के कामकाज पर आधारित थी।
दो साल बाद इंदौर में इस बस सेवा के तहत 86 बसें चल रही हैं। ये सभी बसें लो-फ्लोर, रियर इंजन, ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम और कंप्यूटराइज्ड टिकट वेंडिंग मशीनों से लैस हैं और इनके स्टॉपों पर लगे साइनबोर्डो पर यह भी दर्शाए जाने की व्यवस्था है कि अगली बस कब आएगी। इस बस सेवा में लगी पूंजी अब 40 करोड़ रुपए का आंकड़ा छू रही है जो पूरी तरह निजी क्षेत्र की है।
इस सेवा से शहर को तो फायदा हुआ ही है, इसे चलाने वाले सभी छह निजी निवेशक भी लाभान्वित हुए हैं। इस सेवा के टिकट आम लोगों की पहुंच में हैं और दो साल में इसकी एक भी बस दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुई है। इंदौर में अब आईआईटी, दिल्ली की मदद से बस रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम (बीआरटीएस) के तहत 500 बसें चलाने के लिए खास सड़कें बनाई जा रही हैं। यहां की बस सेवा को अब दुनिया की सबसे अच्छी शहरी बस सेवा माना जा रहा है और केवल कोलंबिया की राजधानी बोगोटा की बस सेवा को इसके समकक्ष रखा गया है।
दिल्ली और दूसरे शहर इंदौर से क्या नसीहत ले सकते हैं? पहली यह कि हमें अस्सी के दशक की इस सोच से बाहर आना होगा कि एक बस का एक ही मालिक होना चाहिए। ‘स्माल इज ब्यूटीफुल’ का यह नजरिया पहले ही देश का बहुत नुकसान कर चुका है। अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग तो यहां तक मानता है कि करीब 800 उत्पादों को लघु उद्योग क्षेत्र के लिए आरक्षित करने की नीति पिछले पांच दशकों की सबसे नुकसानदेह औद्योगिक नीति रही है जिसकी वजह से भारत औद्योगिक क्रांति के मामले में दूसरे देशों से बहुत पिछड़ गया।
खैरियत है कि इंदौर ने 2005 में इस मानसिकता से पल्ला छुड़ा लिया और बस सेवा चलाने के लिए सबसे क्षमतावान उद्यमियों और कंपनियों को चुना। दूसरी नसीहत यह है कि दिल्ली या किसी दूसरे शहर में एक ही रूट पर दो आपरेटरों को बसें चलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसकी वजह से बसें तेज रफ्तार से भागती हैं, लालबत्ती की अनदेखी करती हैं और दुर्घटना का शिकार होती हैं क्योंकि ड्राइवर और कंडक्टर ज्यादा से ज्यादा यात्रियों को ढोकर अपनी कमाई बढ़ाने की होड़ करते हैं।
इसकी जगह हरेक बस मालिक को निश्चित रूट दिए जाने चाहिए और उनका राजस्व उनकी बसों द्वारा तय की जाने वाली कुल दूरी पर निर्भर होना चाहिए। उसकी सही जानकारी बसों की आवाजाही की निगरानी करने वाली जीपीएस प्रणाली से हासिल की जा सकती है। इंदौर में दैनिक और मासिक इलेक्ट्रॉनिक पासों की भी व्यवस्था है। कंपनियों के बीच उनका राजस्व उनके इस्तेमाल के आधार पर बांटा जाता है।
यदि कल को दिल्ली में ब्ल्यूलाइन बसों के राजस्व का वितरण उनके द्वारा तय की जानेवाली दूरी की गणना करके प्रति किलोमीटर के हिसाब से देने की प्रणाली लागू कर दी जाए तो कल से ही सड़क दुर्घटनाओं में होनेवाली मौतों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आ जाएगी।
तीसरी नसीहत यह कि यात्रियों की मांग का आकलन करने, रूटों का नियोजन करने, किराया तय करने, टेंडर जारी करने, रोजमर्रा के कामकाज की निगरानी करने और मेट्रो के स्टेशनों से फीडर रूटों का तालमेल करने के लिए एक नियामक संस्था का होना भी जरूरी है। इंदौर में पांच लोगों की एक टीम नियमित आधार पर यह काम करती है और वहां की बस सेवा की सफलता की वजह भी यही है।
कुछ लोग कह सकते हैं दिल्ली के लिए इंदौर जैसे छोटे शहर का उदाहरण ठीक नहीं है। ये उसी तरह की मानसिकता वाले लोग हैं जो सत्तर के दशक में जापान और अस्सी के दशक में दक्षिण कोरिया के बारे कहते थे कि भारत के लिए ये छोटे देश उदाहरण नहीं हो सकते हैं। दिल्ली को 10 इंदौर की तरह देखिए और वहां की सफलता को यहां 10 गुना दोहराइए।
दो शहरों की इस कहानी की त्रासद नसीहत यही है कि विवेक अग्रवाल जैसे आईएएस अधिकारी, जो जानकारी भी रखते हों और कुछ कर गुजरने की इच्छा भी रखते हो, संयोग से ही सामने आते हैं। ज्यादातर आईएएस अधिकारी तो ताउम्र फाइलें देखने में ही गुजार देते हैं। मुझे तो डर लगता है कि हमारी यथास्थितिवादी व्यवस्था विवेक को उनके अच्छे काम के लिए कहीं दंडित न करने लगे क्योंकि उसे कुछ कर गुजरने वाले लोग जरा भी नहीं सुहाते हैं।
फिर भी विवेक 20 लाख इंदौरियों को गर्व करने लायक बस सेवा उपलब्ध कराने का संतोष अनुभव कर सकते हैं जो बिरले सरकारी अधिकारियों को ही नसीब होता है। इंदौर से जो एक और बात सीखी जा सकती है वह यह कि देश के सभी शहरों में अच्छी बस सेवा के लिए प्रतिस्पर्धा सर्वश्रेष्ठ तरीका है।
अलबत्ता, इस प्रतिस्पर्धा का समुचित नियमन भी जरूरी है। समुचित नियमन के बगैर प्रतिस्पर्धा खतरनाक हो सकती है जैसाकि हम दिल्ली में देख रहे हैं। किसी भी शहर में निगरानी और परिचालन के तंत्र अलग-अलग होने चाहिए। योजना बनाने और निगरानी करने का काम संबंधित शहर के प्रशासन का होना चाहिए और बसें चलाने का काम कारोबारियों का होना चाहिए।