अभिमत. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रायसीना हिल्स पर स्थित राष्ट्रपति भवन में प्रत्येक शनिवार को होने वाले चेंज ऑफ गार्डस समारोह का आम लोगों के लिए खोला जाना भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण घटना है। इसे आम देशवासियों में अपने लोकतंत्र के प्रति गौरव की भावना पैदा करने की एक सार्थक पहल भी कहा जा सकता है।
चेंज ऑफ गार्डस का साक्षी बनने वाले आम नागरिकों को विशाल लोकतंत्र का हिस्सा होने के आत्मगौरव का अहसास तो होगा ही, वे इन क्षणों को जीवनभर अपनी स्मृतियों में संजोए भी रहेंगे। ब्रिटिश शासकों के लिए सन 1773 से, जब राष्ट्रपति भवन को वायसराय हाउस के नाम से जाना जाता था, शुरू हुई चेंज ऑफ गार्डस समारोह की रस्म अदायगी भले ही अपने वैभव और परंपराओं का दिखावाभर रही हो और भले ही इसे लंदन के बकिंघम पैलेस में होने वाले ऐसे ही समारोह की नकल के तौर पर आरंभ किया गया हो लेकिन स्वतंत्रता के 60 साल बाद तक भी इसका आम नागरिकों की पहुंच से बाहर बने रहने का औचित्य समझ से परे है। यह बात भी आसानी से गले नहीं उतरती है कि प्रतिभाताई पाटील के पूर्ववर्ती तमाम राष्ट्रपतियों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया।
दरअसल, राष्ट्रपति भवन वास्तुकला का एक अप्रतिम उदाहरण या फिर एक वैभवशाली ऐतिहासिक इमारतभर नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र की विशिष्ट पहचान भी है। निश्चित रूप से प्रतिभाताई पाटील ने चेंज ऑफ गार्डस समारोह को लोगों को लिए खोले जाने और उसे अधिक आकर्षक बनाने के निर्देश देकर राष्ट्रपति भवन को लोगों से जोड़ने की दिशा में ऐसा कदम उठाया है जिसे पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा। आमजन वहां के वैभवशाली समारोह में दर्शक के रूप में भागीदार होकर निश्चित ही राष्ट्र के प्रथम पुरुष से सीधा जुड़ाव महसूस करेंगे।