सम्पादकीय. पाकिस्तान में राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपने निजी एजेंडे को पूरा करने के बाद 42 दिन पुरानी इमरजेंसी शनिवार को भले ही हटा ली, पर इस अवधि में उठाए गए तमाम कदमों से उनकी साख पर लगे बट्टे की भरपाई हो पाना मुश्किल है। इमरजेंसी लगाने के पीछे मुशर्रफ का मुख्य उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के उन जजों से पिंड छुड़ाना था जो पहली बार देश की न्यायपालिका को सेना और सरकार से स्वतंत्र होने का अहसास दिला रहे थे। मुशर्रफ को आशंका थी कि ये जज राष्ट्रपति पद पर उनके दोबारा निर्वाचन को अवैध करार दे सकते हैं। इसी वजह से इमरजेंसी लगाते ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस समेत उन तमाम जजों को बदल डाला जिन्हें वे अपनी राह का रोड़ा समझ रहे थे। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में अपने चुनाव को भी कोर्ट से वैध ठहरवा लिया और बगैर वरदी में राष्ट्रपति पद की शपथ भी ले ली। सेना प्रमुख पद के लिए अपनी पसंद के अशफाक परवेज कियानी को वे पहले ही चुन चुके थे इसलिए फिलहाल वे सेना की तरफ से बगावत को लेकर भी निश्चिंत हो सकते हैं। इमरजेंसी हटाने के पहले उन्होंने 1973 के संविधान में भी कई संशोधन कर दिए ताकि इमरजेंसी के दौरान के उनके फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सके।
चूंकि सुप्रीम कोर्ट के बर्खास्तशुदा जजों ने इमरजेंसी को पहले ही गैर-कानूनी ठहरा दिया था इसलिए कानून के शासन में भरोसा करने वाला एक वर्ग इमरजेंसी के दौरान मुशर्रफ द्वारा लिए गए तमाम फैसलों को भी अवैध मानता है जिनमें 8 जनवरी को हो रहे आम चुनाव भी हैं। लेकिन तहरीक-ए-इन्साफ पार्टी के प्रमुख पूर्व क्रिकेटर इमरान खान सरीखे ऐसे लोगों की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज से ज्यादा अहमियत नहीं रखती है। बेनजीर की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मुशर्रफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग समेत ज्यादातर पार्टियों के चुनाव में भाग लेने से चुनाव बॉयकाट की तमाम अपीलें बेमानी हो चुकी हैं। यह अलग बात है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी से निगरानी कराने की मुशर्रफ की तैयारी के बावजूद कोई भी जानकार इन चुनावों के निष्पक्ष और स्वतंत्र होने की उम्मीद नहीं करता है। चुनावों में संभावित धांधली का सबसे ज्यादा घाटा नवाज शरीफ और उनकी पार्टी को होने का अंदेशा है जो अरसे से मुशर्रफ की आंखों की किरकिरी रहे हैं। मौजूदा हालात में मुशर्रफ अमेरिका की मजबूरी हैं इसलिए उनकी अलोकप्रियता की चिंता किए बगैर जॉर्ज बुश और उनका प्रशासन मुशर्रफ के पीछे खड़ा है। विकल्प मिलने पर वह मुशर्रफ को हटाने के बारे में सोच सकता है।