ओह! शीतलहर, तुम अभी क्यों आई? इस तरह अचानक आ धमकना और निरीह जनता को कंपकंपा देने का काम तो सिर्फ पुलिस करती है। ये पुलिसिया अंदाज में तुम बेवक्त क्यों आई गईं? क्या तुम्हें पता है कि हम अदूरदर्शियों ने किसम-किसम के पुतले उस समय फूंके जब ठंड का नामो-निशान नहीं था। हम तो सोच रहे थे कि ठंड अब इतिहास में पढ़ाई जाएगी और इसीलिए हमने अपने स्वेटर, शाल, मफलर को ही पुतले बना-बनाकर जलाए।
हम ग्लोबल वार्मिग के बहाने अंतरराष्ट्रीय चिंतन के बेहतरीन नाटक में लगे थे कि तुमने यूं सहसा आकर हमें हिला दिया। यह समय सरकारें हिलने का है। शीतलहर में हम हिलने लगे तो लोग हमें सरकार समझ बैठेंगे। हम सरकार तो हैं नहीं कि बस्तियां की बस्तियां जलाकर ताप लेंगे। अब तो पेड़ भी नहीं बचे तापने को। स्वयं को तापने के लिए अब अकसर हमें ही जलना पड़ता है।
हम कांग्रेसी भी नहीं हैं कि सांवेर से लेकर खरगोन तक विजय जुलूस में नाच-नाचकर पसीना-पसीना हो जाएं या जीभर के पटाखे जलाकर ताप लें। हम भाजपाई भी नहीं हैं कि हार के नाम पर रजाई में दुबककर मुंह छिपा लें। ओह जिद्दी शीतलहर, तुम तो ऐसे उन्मुक्त होकर आ रही हो जैसे सरकार ही तुम्हारी हो। तुम्हें किसी का भी रत्तीभर खौफ नहीं दिखता। क्या थानों में और क्या कानों में, तुम तो ऐसे घुसी जा रही हो कि तुम्हारा कोई क्या बिगाड़ लेगा? तुमसे अच्छे तो वो अवैध होर्डिग हैं जो सिर्फ आंखों को चुभते हैं। तुम तो पूरे बदन को चुभ रही हो। अब तो हमें सिर्फ राजनीतिक पार्टियों का ही सहारा दिखता है जिनके सैकड़ों चुनावी होर्डिग अब जलाए जा सकेंगे। वे दल हमें जब तपाएंगे तब तपाएंगे पर अभी तो हम उनके होर्डिग जलाकर ताप लें। ओह शीतलहर.. ये अच्छी बात नहीं है।