जोधपुर. नेशनल लॉ कॉन्फ्रेंस (नेलकॉन-2007) के समापन समारोह में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि क्राइम का ट्रेंड बदल गया है, लेकिन न्याय व्यवस्था अब भी पुरानी है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया और बार काउंसिल ऑफ राजस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय नेलकॉन-2007 जयनारायण व्यास स्मृति भवन में रविवार को संपन्न हो गई।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अशोक भान और राज्यसभा सदस्य डॉ.अभिषेक मनुसिंघवी ने क्राइम के बदलते नए ट्रेंड में पुरानी न्याय व्यवस्था पर गहरी चिंता जाहिर की। जस्टिस भान ने न्यायिक व्यवस्था से ही सवाल पूछा- क्या हम बदलते समय में नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं? तो कहां हैं प्रशिक्षित अधिवक्ता, कहां हैं प्रशिक्षित आर्ब्रिटेटर। एक ओर भारत में बैठा व्यक्ति यूएसए के शेयर खरीद सकता है। ग्लोबलाइजेशन के जमाने में साइबर और स्पेस क्राइम हो रहे हैं। ऐसे हालात में भी देश की न्यायिक व्यवस्था पुराने र्ढे पर दौड़ रही है। यहां अधिवक्ताओं की सर्वोच्च संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पदाधिकारी मौजूद हैं। बार को चाहिए कि वह अधिवक्ताओं को तैयार करे। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अकादमी भोपाल में है, जबकि एडवोकेट एकेडमी कहीं नहीं है।
समारोह की शुरुआत में राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बालिया ने जोधपुर में नेशनल लॉ कान्ॅफ्रेंस आयोजित करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया, बार काउंसिल ऑफ राजस्थान और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अशोक माथुर, डी.सी.भंडारी व जी.सी.सिंघवी का आभार जताया। बार काउंसिल ऑफ राजस्थान के अध्यक्ष अशोक मेहता ने स्वागत भाषण दिया।
बार काउंसिल के पूर्व चेयरमैन और अतिरिक्त एडवोकेट जनरल एन.एम.लोढ़ा ने विषय परिचय देकर आयोजन के बारे में बताया। समारोह को बार काउंसिल के सदस्य सी.के.शर्मा बरूआ, बार काउंसिल राजस्थान के सदस्य संदीप मेहता ने भी संबोधित किया। कॉन्फ्रेस के सह संयोजक मनीष सिसोदिया ने आभार जताया। पल्लव सिसोदिया ने संचालन किया।
मीडिया ट्रायल सीमा उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अशोक माथुर, सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता, राज्यसभा सदस्य व कांग्रेस प्रवक्ता डॉ.अभिषेक मनुसिंघवी ने मीडिया ट्रायल पर न्यायिक व्यवस्था की किरकिरी करने का आरोप लगाते हुए संसद से शीघ्र ही ब्रॉडकास्ट बिल लाते हुए इसमें संतुलन बनाने की वकालात की। वक्ताओं ने सौ करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले देश में 100 से अधिक चैनलों और मशरूम की तरह उगने वाले इलेक्ट्रॉनिक व पिंट्र मीडिया को न्यायिक व्यवस्था के लिए खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था की सहायता करने वाला मीडिया आजकल अधिकांश मामलों में अपनी ओर से ही ट्रायल करता है व अपना ही फैसला सुना देता है।
सार्क स्कूल ऑफ लॉ की जरूरत
सिंघवी ने ग्लोबलाइजेशन की ओर कदम बढ़ाते हुए कम से कम आठों सार्क देशों की सम्मिलित सार्क लॉ स्कूल शुरू करने और उसकी डिग्री को सभी सार्क देशों में मान्यता देने की वकालत की।
मनी लॉड्रिंग और घरेलू हिंसा के मामले
न्यायाधीश माथुर ने न्यायिक व्यवस्था के सामने नई चुनौती के रूप में उभरे मनी लॉड्रिंग व महिला हिंसा के मुकदमों से निपटने के लिए विशेष तैयारी की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि आतंकवादियों और तस्करों से संबंधित इस कानून का अध्ययन करने व कुछ संशोधन करने की भी आवश्यकता है। साथ ही महिला हिंसा व दहेज से जुड़े मामले भी न्यायिक व्यवस्था के लिए चुनौती हैं।
कानूनी शिक्षक की हालत खराब
देश की लॉ कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों की दुर्दशा का जिक्र करते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि आईआईटी अथवा मैनेजमेंट संस्थानों में कार्यरत शिक्षक की तरह लॉ कॉलेज के शिक्षक के लिए आकर्षक पैकेज नहीं होता। यही कारण है कि अच्छे शिक्षकों के अभाव में विद्यार्थी भी औसत ही निकलते हैं। उन्होंने देश भर के लॉ स्टूडेंट्स का प्रतिवर्ष टॉप 10 की मेरिट तैयार करते हुए अन्य संस्थानों की तरह प्लेसमेंट की व्यवस्था किए जाने की भी आवश्यकता जताई।