अभिमत. मौजूदा पीढ़ी के ज्यादातर किशोरों के साथ कुछ गड़बड़ जरूर है। वे बुद्धिमान हैं, सक्षम हैं और दुनियादारी भी समझते हैं मगर उनमें असामाजिकता और असहिष्णुता की बढ़ती प्रवृत्ति इस बात का संकेत है कि उनका जिस तरह की समस्याओं से साबका पड़ता है उनका समाधान उनके बूते में नहीं है। दुर्भाग्य से अपने देश में किशोरों की समस्याओं पर न तो अपेक्षित ध्यान दिया जाता है और न ही उन पर चर्चा ही की जाती है।
किशोरों की समस्याओं को लेकर कुछ जवाब तो स्थायी भाव से बन गए हैं, जैसे माता-पिता ध्यान नहीं देते होंगे, दूसरों से बेहतर करने का दबाव होगा, स्कूल का वातावरण अनुकूल नहीं होगा आदि-आदि। ये समस्याएं पहले भी रही हैं और आगे भी रहेंगी।
आज की पीढ़ी को जितनी सुविधाएं और साधन उपलब्ध हैं उतने पहले कभी नहीं थे। फिर भी, उसमें बात-बात में साथियों से झगड़ा करने, मारपीट या गाली-गलौच करने, छिटपुट अपराध करने आदि की प्रवृत्तियां पहले से कहीं ज्यादा हैं।
ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को अनजाने व्यक्तियों से बात नहीं करने की नसीहत देते हैं मगर इंटरनेट पर बैठे किशोरों की निगरानी करना टेढ़ी खीर है। वहां तो माउस के हर क्लिक पर मस्तिष्क और भावनाओं को प्रभावित करने वाले अनगिनत खतरे मौजूद हैं। माता-पिता के लिए इंटरनेट पर बैठे बच्चे पर नजर रखना संभव नहीं है। बच्चों की संतुष्टि के लिए वैकल्पिक मेकेनिज्म विकसित करना होगा।
किशोरावस्था हरदम आनंद और स्वीकृति तलाशती है। आसपास न मिलने पर इनकी तलाश अन्यत्र की जाती है। इंटरनेट से इन दोनों के मिलने की संभावना रहती है लेकिन उसमें नकारात्मक सामग्री भी अथाह है। इसकी वजह से भी बहुत से किशोर अपराधों की ओर प्रवृत्त हुए हैं।
बच्चे इंटरनेट का सही इस्तेमाल करें इसके लिए माता-पिता, शिक्षकों और मनो-सलाहकारों को सूझ-बूझ से काम करने की जरूरत है। उम्र के इस नाजुक दौर को आनंदमय और सुरक्षित बनाना हर किसी की जिम्मेदारी है।