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पुलिस के थर्ड डिग्री तरीके और मानवाधिकार

आलेख. atrocity अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए एक बार फिर खबरों में है। इसकी वजह उसकी यह स्वीकारोक्ति है कि उसने लगभग पांच साल पहले संदिग्ध आतंकवादियों से की गई पूछताछ के वीडियो टेप नष्ट कर दिए हैं। सीआईए ने यह स्वीकारोक्ति न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक सनसनीखेज खुलासे पर प्रतिक्रिया जताते हुए की है। कहा जा रहा है कि सीआईए मानती है कि टेप एजेंसी की आंतरिक अनुमति से नष्ट किए गए और ऐसा करना कतई गैर-कानूनी नहीं है।

सीआईए के महानिदेशक माइकेल हेडन मानते हैं कि नष्ट किए गए टेपों का खुफिया दृष्टि से कोई महत्व नहीं था और यदि उन्हें सुरक्षित रखा जाता तो वे संदिग्ध आतंकवादियों से पूछताछ करने वाले सीआईए के कर्मियों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते थे। मुझे बताया गया है कि सीआईए ने संदिग्ध आतंकवदियों से पूछताछ करने में जिन बर्बर तरीकों का इस्तेमाल किया वे कठोर से कठोर व्यक्ति को भी दहला सकते हैं। टेपों में पूछताछ का जो ब्योरा दिखाया गया था वह पूरी दुनिया में उत्पीड़न की उदारतम व्याख्या का भी घोर उल्लंघन था।

संदिग्ध अपराधियों से पूछताछ के दौरान थर्ड डिग्री तरीकों का इस्तेमाल पूरी दुनिया में आम है। कोई भी बड़ा पुलिस बल (लंदन की मेट्रोपॉलिटन पुलिस समेत) इसका अपवाद नहीं है। भारत में पुलिस द्वारा थर्ड डिग्री तरीकों के इस्तेमाल के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। इनमें केरल का राजन हत्याकांड और बिहार के भागलपुर का आंखफोड़वा कांड बहुचर्चित रहे हैं। पुलिस हिरासत में मौतों के सिलसिले का तो कोई अंत ही नहीं है।

हमारी पुलिस कई दफा लोगों को पकड़कर उनकी गिरफ्तारी रोजनामचे में दर्ज नहीं करती। ऐसे लोगों के साथ वह अक्सर बहुत बुरा सलूक करती है। ऐसे में जब किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है तब नाराज आम जनता भारी हो-हल्ला करती है। इसका सबसे पीड़ाजनक पहलू यह है कि पुलिस उत्पीड़न के शिकार महज संदिग्ध अपराधी ही नहीं होते बल्कि ऐसे बेकसूर व्यक्ति भी होते हैं जिनसे संबंधित थाने या चौकी के अधिकारियों की निजी खुन्नस होती है।

इस संदर्भ में सीबीआई या आईबी सरीखी केंद्रीय जांच एजेंसियों की साख राज्यों की पुलिस से कहीं बेहतर है। आईबी पर महज एक बार करीब एक दशक पहले इसरो मामले में पूछताछ के दौरान अनुचित तरीके इस्तेमाल करने का आरोप लगा था। अन्यथा न तो सीबीआई और न ही आईबी संदिग्ध व्यक्तियों से पूछताछ में मारपीट या अन्य थर्ड डिग्री तरीके अपनाती हैं।

ऐसे तरीके तभी इस्तेमाल किए जा सकते हैं जबकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अवैध हिरासत और उत्पीड़न को बढ़ावा देते हैं। राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने उन्नीस सौ अस्सी के दशक में उत्पीड़न और अवैध हिरासत के मामलों को आड़े हाथों लिया था। उसने हिरासत में होने वाली मौतों और बलात्कार के मामलों की वर्तमान में होने वाली मजिस्ट्रीयल जांच की जगह न्यायिक जांच अनिवार्य करने की सिफारिश की थी।

चूंकि मजिस्ट्रेट नागरिक प्रशासन का अंग होते हैं इसलिए उनकी जांच रिपोर्ट्े अक्सर संदिग्ध रहती हैं। राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने पुलिस ज्यादतियों के मामले देखने के लिए जिला पुलिस शिकायत अधिकरण के गठन का सुझाव भी दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने गत सितंबर में व्यापक पुलिस सुधार लागू करने संबंधी अपने आदेश में भी ऐसे अधिकरणों की स्थापना की बात कहीं थी मगर ज्यादातर राज्य सरकारों ने इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल रखा है। उत्पीड़न और हिरासत में मौतों की रोकथाम के लिए पुलिस आयोग समय-समय पर व्यावहारिक निर्देश जारी करता रहा है। अब सवाल उठता है कि उत्पीड़न के कितने मामले लोगों के सामने आ पाते हैं।

आम धारणा है कि मीडिया और न्यायपालिका की सजगता के बावजूद पुलिस उत्पीड़न के बहुत से मामले इसलिए सामने नहीं आ पाते क्योंकि उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति या रिश्तेदार पुलिस द्वारा बदले की कार्रवाई किए जाने के भय से अपना मुंह बंद रखते हैं।

पुलिस में भरती के समय मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के जरिये ऐसे व्यक्तियों की छंटनी की जा सकती है जो भावनात्मक रूप से अस्थिर हों मगर दुनियाभर में ऐसे परीक्षणों की विश्वसनीयता संदिग्ध रही है। इसके अलावा नई पीढ़ी के पुलिसकर्मियों को गहन प्रशिक्षण देकर और उनमें मानवाधिकारों की गहरी समझ विकसित कर उनमें आम नागरिकों का उत्पीड़न नहीं करने की प्रवृत्ति विकसित की जा सकती है।

पुलिस को मानवीय चेहरा देने के लिए राष्ट्रीय पुलिस अकादमी (जहां आईपीएस अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है) और राज्यों के पुलिस प्रशिक्षण कालेजों के पाठ्यक्रमों में उल्लेखनीय बदलाव किए गए हैं।

ये बदलाव तभी कारगर हो सकते हैं जबकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और राज्यों का राजनीतिक नेतृत्व (मुख्यमंत्री) दो-टूक तरीके से यह स्पष्ट कर दे कि वे पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हैं और इसके जरिये हासिल किए जाने वाले नतीजों को न्यायोचित नहीं मानते हैं। क्या हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि हमारी पुलिस और राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा नजरिया रखने वाले लोग पर्याप्त संख्या में हैं? मैं चाहूंगा कि इस पसोपेश वाले सवाल का जवाब पाठक खुद ही तलाशें।

-लेखक सीबीआई के निदेशक रह चुके हैं।





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