सम्पादकीय. बेंगलूर के डॉक्टर मोहम्मद हनीफ ने ऑस्ट्रेलिया में एक और कानूनी लड़ाई जीतकर आतंकी गतिविधियों से संबंधों को लेकर अपने ऊपर लगे दाग को धो डाला है। वैसे तो एक निचली अदालत के जज जेफरी स्पेंडर ने गत अगस्त में ही हनीफ का वर्क वीजा बहाल कर दिया था, मगर ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए संघीय अदालत में अपील की थी।
संघीय अदालत ने सर्वसम्मति से सरकार की अपील को नामंजूर करते हुए निचली अदालत के फैसले को बहाल रखा। इस मामले में ऑस्ट्रेलियाई पुलिस और सरकार दोनों ने ही शुरू में बेहद उतावलापन दिखलाया।
अपनी नवजात बच्ची को देखने भारत आ रहे हनीफ को 2 जुलाई को ब्रिसबेन हवाईअड्डे से महज इस कारण पकड़ लिया गया कि उनके मोबाइल फोन का पुराना सिमकार्ड लंदन में नाकाम आतंकी हमला करने वाले उनके रिश्ते के भाई के पास से बरामद हुआ था। इसी आधार पर हनीफ का वर्क वीजा रद्द कर दिया गया और ब्रिसबेन के गोल्ड कोस्ट अस्पताल की उनकी नौकरी भी छूट गई।
यह तो हनीफ का जीवट था कि उन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए धीरज से काम लिया और पुलिसिया तरीकों के सामने टूटे नहीं वरना ऐसे मामलों में फंसने के बाद कई बेगुनाहों को बचाव का कोई रास्ता नहीं सूझता है।
यह अलग बात है कि हनीफ के मामले में ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने शुरू से ही सकारात्मक भूमिका निभाकर अपने देश की पुलिस और सरकार को आईना दिखा दिया। इसी का नतीजा था कि ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने हनीफ के खिलाफ आरोप वापस ले लिए और 25 दिन की हिरासत के बाद उन्हें रिहा कर दिया।
संघीय अदालत के फैसले के बाद ऑस्ट्रेलिया के आव्रजन मंत्री क्रिस इवान्स ने अपने देश में उनकी वापसी में कोई रुकावट नहीं रहने की बात जरूर कही है मगर खुद हनीफ ऑस्ट्रेलिया लौटकर अपने पुराने अस्पताल में फिर से काम करना चाहेंगे या नहीं यह भविष्य के गर्त में है। हां, यह जरूर तय है कि वे अब ऊहापोह से मुक्त होकर अपनी सामान्य जिंदगी फिर से शुरू कर सकते हैं।
जहां तक ऑस्ट्रेलियाई सरकार के खिलाफ मानहानि या मुआवजे के लिए दावा करने का सवाल है, इन अनावश्यक विवादों में उलझने की बजाय अपने कैरियर पर ध्यान देना ही हनीफ के लिए श्रेयस्कर होगा। वे यह काम ऑस्ट्रेलिया स्थित भारतीय उच्चयोग पर छोड़ सकते हैं जो अतंरराष्ट्रीय राजनय के मानदंडों के परिप्रेक्ष्य में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम है।