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7 कलेक्टरों ने माना था गुर्जरों को जनजाति

जयपुर. राज्य सरकार ने चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर गुर्जरों को जनजाति में शामिल करने की मांग को भले ही खारिज कर दिया हो, लेकिन गुर्जर बहुल 16 जिलों में से 7 के कलेक्टरों ने राज्य सरकार को इस बात की स्पष्ट रिपोर्ट दी थी कि उनके क्षेत्र के गुर्जर जनजाति में शामिल होने के लिए केंद्र की ओर से तय सभी पांच मापदंड पूरे करते हैं।

उन्होंने इसी आधार पर गुर्जरों को जनजाति में शामिल करने की सिफारिश भी की थी। कलेक्टरों से यह रिपोर्ट राज्य सरकार ने केंद्र से आई उन चिट्ठियों के जवाब में मांगी थी, जिनमें राज्य सरकार से अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने योग्य जातियों की सूची मांगी गई थी।

कलेक्टरों ने यह रिपोर्ट अलग-अलग समय पर राज्य सरकार को सौंपी थी। प्रदेश के करीब 20 जिले गुर्जर बाहुल्य माने गए हैं। इनमें से 16 जिलों के कलेक्टरों ने सरकार को गुर्जरों के पक्ष में मिली-जुली रिपोर्ट भेजी थी।

पांच जिला कलेक्टरों ने माना था कि गुर्जर 26 साल पहले तय किए गए पांच मापदंडों में से चार आज भी पूरा करते हैं। तीन जिला कलेक्टरों ने तीन मापदंड और बारां कलेक्टर ने दो मापदंड पूरे करने की रिपोर्ट दी।

हालांकि सरकार ने कलेक्टरों की यह रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर जारी नहीं की है, लेकिन गुर्जर आरक्षण आंदोलन की अगुवाई कर रहे कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला ने इन रिपोर्टो के आधार पर दावा किया है कि 50 फीसदी कलेक्टरों की रिपोर्ट गुर्जरों के पक्ष में थी।

बैसला और अन्य गुर्जर नेताओं का दावा है कि जस्टिस चोपड़ा कमेटी ने भी यह कहीं नहीं कहा कि गुर्जर निर्धारित पांच मापदंड पूरे नहीं करते हैं। कमेटी ने केवल यही कहा है कि जो पांच मापदंड तय किए गए हैं, वे आज के समय में अप्रासंगिक हैं, इसलिए इन्हें बदला जाना चाहिए। इस तरह सरकार को गुर्जरों के पक्ष में रिपोर्ट भेजनी चाहिए थी।

गुर्जर 26 साल पहले भी सक्षम नहीं थे : राज्य सरकार का दावा है कि वर्ष 1981 में राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा गुर्जरों को सक्षम मानकर जनजाति में शामिल करने की मांग को खारिज कर दिया गया था।

दूसरी ओर समाज कल्याण विभाग की ओर से केन्द्रीय संयुक्त सचिव को 17 अक्टूबर, 1981 को लिखे गए पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि बंजारा और गाड़िया लुहार के अतिरिक्त अन्य समरूप जातियों को जनजाति की सूची में शामिल करना इसलिए उचित नहीं माना था, क्योंकि इससे असंगतियां और विवाद पैदा होने की आशंका थी।

सरकार के खिलाफ नहीं जाऊंगा : कालूलाल
भीलवाड़ा. पंचायती राज मंत्री कालूलाल गुर्जर ने कहा है कि मैं चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट से संतुष्ट हूं लेकिन गुर्जरों को जो मिलना चाहिए वो नहीं मिला। यहां एक प्रेस कांफ्रेंस में जब उनसे पूछा गया कि क्या जयपुर में प्रस्तावित महापड़ाव में वे हिस्सा लेंगे तो उन्होंने कहा कि जब तक मैं मंत्री हूं, तब तक सरकार के विरोध में किए जाने वाले किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाऊंगा।

मापदंड बदलने पर केंद्र जल्द करेगा फैसला
पंकज कुमार पांडेय. नई दिल्ली.

जनजातियों के निर्धारण के पुराने पड़ चुके मानकों को बदलने के सुझावों पर केंद्र सरकार ने विचार शुरू कर दिया है और इस बारे में जल्दी ही फैसला लिया जाएगा। यह बात आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्री पीआर किंडिया ने भास्कर से एक खास बातचीत में कही।

राजस्थान में गुर्जरों को आरक्षण देने की मांग के संबंध में उन्होंने कहा, ‘हम लोकुर कमेटी की सिफारिशों से बंधे हैं’। किंडिया ने कहा कि जनजाति सूची में पहले से मौजूद जातियां नई जनजातियों को इसमें शामिल किए जाने का विरोध कर रही हैं।

समग्र होगी नई जनजाति नीति : किंडिया के अनुसार नई जनजातीय नीति समग्र रूप में सामने आएगी। गृहमंत्री शिवराज पाटिल की अध्यक्षता में गठित मंत्रिमंडलीय समूह इस संबंध में कई बैठकें कर चुका है। कुछ और बैठकों के बाद इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है।

ऐसी है प्रक्रिया : किंडिया ने बताया कि किसी समुदाय को जनजाति की सूची में शामिल करने या न करने की एक निर्धारित प्रक्रिया है। इसके लिए पहले राज्य सरकार को तय मानकों के मुताबिक अपनी सिफारिश केंद्र को भेजनी पड़ती है।

रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया प्रस्ताव की समीक्षा करने के बाद अगर सहमति देता है तो इसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पास भेजा जाता है। इसके बाद केंद्र सरकार की सहमति या असहमति का सवाल आता है।

क्या है बाधाएं
एसटी में कौन सी जातियां शामिल होंगी इस संबंध में लोकुर समिति ने स्पष्ट मानक निर्धारित किए हैं।
गुर्जर उन पुराने मापदंडों पर खरे नहीं उतरते।
गुर्जर आरक्षण के संबंध में चोपड़ा समिति ने कोई स्पष्ट राय नहीं दी है।
राज्य सरकार द्वारा केंद्र के पास चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट को ज्यों का त्यों भेजने का कोई वैधानिक आधार नहीं है।

संविधान विशेषज्ञों की राय
>> यह केंद्र सरकार पर निर्भर है कि वह राज्य सरकार की रिपोर्ट पर विचार करे या नहीं। इस संबंध में कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है।
सुभाष कश्यप, संविधान विशेषज्ञ

>> ‘जब तक मामला मेरे पास नहीं आता, इस पर कुछ नहीं कह सकती।’
उर्मिला सिंह, अध्यक्ष राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग





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