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अमेरिका की आलोचना इंदिरा की ‘जरूरत’ थी

वॉशिंग्टन. अमेरिका द्वारा भारत को प्रमुख देश मानने के बाद इंदिरा गांधी एक तरफ तो चाहती थीं कि भारत और अमेरिका के बीच बराबरी के आधार रिश्ते बेहतर हों लेकिन वे यह भी महसूस करती थीं कि अमेरिका की आलोचना जरूरी है जैसे यह उनकी ‘पैथोलॉजिकल जरूरत’ हो।

यह विश्लेषण अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रीय सचिव हैनरी किसिंजर ने तत्कालीन राष्ट्रपति गेरॉल्ड फोर्ड के सामने प्रस्तुत किया था। किसिंजर अक्टूबर 1974 में इंदिरा गांधी से मिले थे और उसके बाद उन्होंने यह बात फोर्ड से कही थी। इस मुलाकात के कुछ समय बाद भारत ने परमाणु परीक्षण भी किया था।

अमेरिका द्वारा हाल में जारी किए गए दस्तावेजों से पता चला है कि भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने पर किसिंजर ने इंदिरा से कहा था ‘अमेरिका आपसी आरोपों में नहीं बल्कि इस बात में रुचि रखता है कि परमाणु प्रसार को कैसे काबू में किया जाए।’

किसिंजर ने कहा था ‘आप जैसे चाहें, इसे प्रस्तुत करें लेकिन यह परमाणु विस्फोट बम का था।’ भारत ने कहा था कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि आगामी सरकार परमाणु परीक्षण नहीं करेगी।

किसिंजर ने कहा था ‘हमारी दूसरी मुलाकात में उन्होंने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए पूछा था कि क्या कोई विशेष प्रस्ताव है?’

पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और फोर्ड प्रशासन के टॉप अफसरों ने कहा है कि किसिंजर ने कहा था कि गांधी के साथ बातचीत खुली भी थी और गर्म भी। किसिंजर ने इस बातचीत को इस बात का प्रमाण बताया था कि अमेरिका द्वारा भारत को उप महाद्वीप का महत्वपूर्ण देश स्वीकार किए जाने से गांधी खुश थीं।

अमेरिकी दस्तावेजों में कहा गया है कि गांधी की अमेरिका की निंदा किए जाने की ‘पैथोलॉजिकल जरूरत’ को अगर छोड़ दिया जाए तो वे अमेरिका के साथ ‘ज्यादा बराबरी’ के आधार रिश्ते मजबूत करना चाहती थीं।





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