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घर की पवित्रता बनाए रखना जरूरी है। नित्य साफ-सफाई रखें, लेकिन कभी संध्या काल में झाड़ू नहीं लगाएं। यह परंपरा और शास्त्र विरोधी है। जिन घरों में शाम को झाड़ू लगाकर कचरा बाहर निकाला जाता है, वहां से लक्ष्मी तथा वैभव चले जाते हैं।
जिस परिवार में सुबह साफ-सफाई होती है, वहां सुमति होती है और सुमति ही नाना संपत्तियों की कारक है। जिस घर में अपवित्र होकर प्रवेश किया जाता है, वहां का सद् वातावरण प्रभावित होता है और विवाद तथा क्लेश के कारण उत्पन्न हो जाते हैं। मत्स्यपुराण और गरुड़पुराण सहित समरांगण सूत्रधार में घर में पवित्रता व नित्य सफाई को आवश्यक कहा गया है।
कुछ वास्तुग्रंथों में तो कहा गया है कि अनुपयोगी घर यदि एक मास भी पड़ा रह जाए तो पुन: वास्तुशांति कराई जाए। चीनी वास्तु के मत में यह नकारात्मक ऊर्जा के जमा होने का कारण है और इससे बचना चाहिए।
शास्त्रों में कहा गया है कि कभी अपवित्र होकर घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। यदि कभी अंत्येष्टि संस्कार में जाना पड़े तो लौटकर नीम की पत्तियां चबानी चाहिए। आचमन करना चाहिए।
आग से हाथ सेंककर, जल पात्र को छूकर, गोबर, श्वेत सरसों या सर्षिप जैसी मंगलप्रद वस्तुओं को छूकर और सर्वप्रथम किसी पायदान या कालीन की बजाय पत्थर पर ही कदम रखकर घर में प्रवेश करना चाहिए। ऐसी आज्ञा पारस्कर गृहसूत्र में सर्वप्रथम आई है।
घर की समृद्धि और पवित्रता बनाए रखने के लिए स्पष्ट कहा गया है- निवेशनद्वारे पिचुमन्दपत्राणि विदुश्याचम्योकं अगिAं गोमयं गौरसर्षपांस्तैलमालभ्या श्मानमाक्रम्य प्रविष्यन्ति॥
यही आज्ञा प्रकारान्तर से याज्ञवल्क्य स्मृति में आई है- विदश्य निंबपत्राणि नियता द्वारि वेश्मन:। आचम्याग्न्यादि सलिलं गोमयं गौरसर्षपान्।। विशेष रूप से ईशान कोण में पूजा स्थल और आग्नेय कोण में रसोई स्थल तथा आंगन में ब्रrा स्थल पर अपवित्र रूप से कभी नहीं जाना चाहिए।
इसीलिए स्मृतियों में पवित्रता के साथ ही रोजाना पंचमहायज्ञ, ब्रrायज्ञ या शास्त्रों का पठन-पाठन, देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथि सत्कार अनिवार्यत: करने का निर्देश मिलता है। यह सद्गृहस्थ का लक्षण और परिवार के फलने-फूलने के लिए आवश्यक नियम भी हैं।