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सूर्य चले उत्तरायण को शुरू होंगे शुभ कार्य

ग्रह चाल.sun सूर्य के उत्तर अयन में प्रवेश के साथ ही प्राणहारी शीतकाल समाप्त होने लगता है और बसंत के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है। २१ दिसंबर को सबसे छोटा दिन होता है और २२ दिसंबर को सायन सूर्य मकर में आने के साथ उत्तरायण हो जाता है।

ज्योतिषशास्त्र में गृह निर्माण, देव प्रतिष्ठा, काम्यकर्म, यज्ञ आदि अनुष्ठानों के लिए उत्तरायण काल को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। जीवन के विशेष कार्यो के साथ-साथ मृत्यु तक के लिए उत्तरायण काल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

सूर्य की गति का ही दूसरा नाम अयन है। सूर्य अपने क्रांतिवृत्त पर उत्तर और दक्षिण गमन करता है। आषढ़ से छह मास कर्क से धनु राशि तक सूर्य दक्षिण की ओर गमन (अयन) करता है, यही दक्षिणायन है और मार्गशीर्ष से छह मास मकर से मिथुन राशि तक सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है, यह उत्तरायण कहलाता है।

धर्मशास्त्र के अनुसार सूर्य का तीन-तीन ऋतुओं के क्रम से दक्षिण और उत्तर दिशा की ओर जाना ही अयन कहलाता है - वेद में भी आया है- यान् षण्मासान् दक्षिणादित्य एति, यान् षण्मासानुदङादित्य एति।

सूर्य का उत्तर में गमन का काल उत्तरायण है। मकर में आने के साथ ही सूर्य उत्तरायण हो जाता है, यहीं से दिन बड़े होना शुरू होते हैं। सूर्य की किरणों, जो अब तक धरती पर तिरछी पड़ रही थीं, धीरे-धीरे सीधी होने लगती हैं और उनका तेज भी बढ़ने लगता है।

अयन परिवर्तन ऋतु परिवर्तन का भी संकेत है। एक सौर वर्ष देवताओं का एक दिन रात कहलाता है। दक्षिणायन के छह मास उनकी रात्रि और उत्तरायण के छह मास उनका दिन कहा जाता है - यदर्कर्वष तदेव देवानां दैत्यानां च द्युरात्रम्।

सूर्य के उत्तरायण होते ही देवताओं का ब्रrा मुहूर्त शुरू हो जाता है, अतएव उत्तरायण काल को शास्त्रकारों ने साधनाओं एवं नाना प्रकार की विद्याओं की प्राप्ति के लिए उत्तम काल कहा है। ज्योतिषशास्त्र में गृह निर्माण, देव प्रतिष्ठा, काम्यकर्म, यज्ञ आदि अनुष्ठानों के लिए उत्तरायण काल को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।

जीवन के विशेष कार्यो के साथ-साथ मृत्यु तक के लिए उत्तरायण काल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- ‘जो ब्रrाज्ञानी योगी जन उत्तरायण सूर्य के छह मास में, दिन के प्रकाश में और शुक्ल पक्ष में प्राण त्यागते हैं, वे ब्रrा को प्राप्त होते हैं।’

महाभारत में प्रसंग आया है कि भीष्म पितामह युद्ध में क्षत-विक्षत होकर गिर पड़े और उनका अंतिम काल समीप आ गया। उन्होंने ज्योतिर्विद् सहदेव से तिथि-नक्षत्र आदि के बारे में पूछा और दक्षिणायन जानकर अपने मृत्युकाल को रोक लिया और शर-शैया पर उत्तरायण काल की प्रतीक्षा करने लगे। मकर सम्पात के बाद माघ शुक्ल अष्टमी को उन्होंने प्राण त्यागे।

सूर्य के उत्तर अयन में प्रवेश के साथ ही प्राणहारी शीतकाल समाप्त होने लगता है और बसंत के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है। सूर्य का प्रकाश एवं प्राणदायिनी ऊष्मा निरंतर वृद्धि की ओर अग्रसर होकर प्राणी जगत को आनंद का अहसास देती है। 2१ दिसंबर को सबसे छोटा दिन होता है और २२ दिसंबर को सायन सूर्य मकर में आने के साथ उत्तरायण हो जाता है।

धर्मशास्त्रीय दृष्टि से श्रौत स्मार्त कर्मो, कामना विशेष से किए जाने वाले व्रत, उपवास आदि का प्रारंभ उत्तरायण में करने का विधान है। मुंडन संस्कार भी उत्तरायण में किया जाता है और उसके लिए विहित माघ, फाल्गुन, वैशाख व ज्येष्ठ मास उत्तरायण में ही होते हैं। विद्यारंभ भी उत्तरायण में करना चाहिए। उपनयन संस्कार के संबंध में कहा गया है कि ब्राrाण व क्षत्रियों का उपनयन उत्तरायण में और वैश्यों का दक्षिणायन में करना चाहिए।

उत्तरायण सूर्य में सौम्य देवताओं की प्रतिष्ठा, कुआं, बावड़ी आदि बनवाने का शुभारंभ किया जाता है। दक्षिणायन में इन्हें करने से इसका कोई पुण्य नहीं मिलता। यही कारण है कि शास्त्रों में उत्तरायण सूर्य को विशेष महत्व दिया गया है और भारतीय सूर्य के इस अयन परिवर्तन को उत्सव के रूप में हषरेल्लास के साथ मनाते हैं। अयन परिवर्तन के समय दान, पुण्य, स्नानादि का शास्त्रों में विधान किया गया है।

लेखिका जयपुर में धर्मशास्त्र और भाषाविज्ञान की प्रोफेसर हैं।





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